ग़ज़ल
सिकवे गिले के बाद शिकायत पे आ गये
दर्पण दिखा दिया तो अदावत पे आ गये
उस्ताद रह गये हैं निज़ामत के बास्ते
शागिर्द आज-कल के सदारत पे आ गये
धोखे मिले किसी को, किसी को दगा मिली
कुछ झूंठ बच रहे थे हुकूमत पे आ गये
बचपन में खेल और जबानी अयाल में
लाचार हो गये तो ज़ियारत पे आ गये
पेबन्द क्या लगा मेरे कुर्ते की जेब में
सारे अज़ीज़ खुलके बगावत पे आ गये
इस कशमकश में आज भी मुंसिफ़ फरार है
चूहे भी बिल्लियों बकालत पे आ गये
आबिद तमाम उम्र भटकते कहां- कहां
अच्छा हुआ जो राहे-मुहब्बत पे आ गये
इरफ़ान "आबिद"
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