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ज़ख्म-ए-जिगर

Abhishek Gupta

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            इंतज़ार की तड़प में सुलगता रहा है मन,
        
                                                    
                            
ज़ख्म-ए-जिगर था जो वो अचानक उभर गया।
ढूँढूँ कहाँ खुद को मैं तेरी गली के बाद,
मैं तो तुम्हारे शहर में जाकर बिखर गया।
लौट आओ अब कि सांस का धागा है ,
तेरी कमी से आज मेरा दिल दहल गया।
4 घंटे पहले
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