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सहयात्री का चिंता

Abhishek Gupta

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            लाल बस की लाल बत्ती,
        
                                                    
                            
और वो हरी रंग का झंडा,
रेल की पटरियों पर गूँजता,
वही पुराना एक फंदा।

चलते-फिरते न जाने कितने यात्री,
मन में सवाल बिठाए हैं,
बीते कल की यादें ओढ़े,
आने वाले कल की फ़िक्र में आए हैं।

फिर उसी रास्ते पर मुड़ना,
फिर वही बातें दोहराना,
मुँह में कुछ और,
मन में कुछ और, बस चलते ही जाना।

कोई अनुमान नहीं,
कोई शांति नहीं,
बस विचारों का एक मेला है,
बिना कुछ सोचे-समझे, हर शख्स यहाँ अकेला है।

क्या पता,
उस बस की घंटी फिर कब बजेगी?

क्या पता,
उस रेल की गड़गड़ाहट फिर कब सजेगी?

न जाने कितने 'किन्तु-परन्तु' लिए,
वो खुद से लड़ रहे हैं,
क्या कोई उनकी सराहना करेगा,
जो चुपचाप आगे बढ़ रहे हैं?

पटरियों की वो गड़गड़ाहट,
और बादलों का वो गरजना,
क्या सुन पाएगा कोई,
इस दबे हुए इंसान का तड़पना?

जो अपनों से हारकर,
अपने अंतिम सवाल की बेचैनी में खो गया,
दुनिया के किसी अनजाने कोने में,
अपनी ही यादों का होकर रह गया।

अपने ही कर्मों और अत्यधिक सोच के भारी बोझ तले,
क्या मानसिक सुकून खो जाएगा,
इस दुनिया के छले?

क्या फिर वही लाल रंग की गाड़ी,
वही मंज़र सामने आएगा?

या कोई सहयात्री मिलेगा,
जो उन्हें गले से लगाएगा?
-अभिषेक गुप्ता
2 घंटे पहले
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