क्या अब भी मैं शांत,
मौन होकर तुम्हें बस निहारता रहूँ?
या बेफ़िक्र होकर इन घने बादलों में,
खुद को विचारता रहूँ?
इस अंधियारी रात की खातिर,
न जाने क्या-क्या कहना छोड़ दिया,
मंथन के इस उथल-पुथल में,
मैंने खुद को उलझाना छोड़ दिया।