विज्ञापन

इस नए सफ़र में अब गले से लगाओ मुझे।

Abhishek Gupta

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            चाह में तेरी...
        
                                                    
                            
मनाऊँ किसे, जब यहाँ राहें भी कई हैं,
जाऊँ तो जाऊँ मैं अब किस ओर।
मंज़िल की तलब अब कठिन नहीं लगती,
कदमों में उठा है जो ऐसा ये ज़ोर।
तलवारें कहें या फिर कहें इन्हें परवाने,
ढूंढते हैं रास्ता इन गलियों में।
जाना था जिसने किसी के मन की गहन को,
बातें अलग हैं अब उन कलियों में।
मज़ाक किया जिसने भी अपने कथन से,
लोग कहते-कहते अब थकते नहीं।
अपनी ज़ालिम राहों को खुद ही चुना है,
प्रपात के किनारे के धागे अब टूटते नहीं।
गांधीजी के साथी नहीं हैं जो विचार,
फिर क्यों ये बदन काँप जाता है।
मैं अकेला नहीं हूँ इस सफर में अब,
हर रास्ता मुझे अपनी ओर बुलाता है।
खुद में ही खोया जा रहा हूँ मैं आज,
तेरी अपनों वाली सच्ची चाह में।
तू भूल न जाना मुझे इस मोड़ पर आकर,
मैंने तन्हा वक़्त गुज़ारा है तेरी राह में।
चेहरे से कई खूबसूरत तेरी ये बातें हैं,
मन में छुपी एक अनकही सी आस है।
परियों की परी पीछे छूटी है कहीं,
मदहोश हूँ मैं, क्योंकि तू मेरे पास है।
नशा भी नहीं है कोई अब तुम्हारे बिन यहाँ,
मधु की शाला सजी है इस रात में।
पैरों में घुँघरू बाँधकर मैं आज झूम लूँ,
कुछ तो अधिक छुपा है तेरी इस बात में।
कहाँ की रूढ़िवादी बातें सिखाते हो,
ये दुनियादारी का पाठ न समझाओ मुझे।
मैं तेरा अकेला नहीं, तू मेरी है आस,
इस नए सफ़र में अब गले से लगाओ मुझे।
एक महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Manju Sharma

3561 कविताएं

View Profile