हकीकत क्या है... मैं ना जानूँ,
तुम्हारी आँखों में बस सत्य पहचानूँ।
तुम्हारे भरोसे ही मैं जी रहा हूँ,
हर घड़ी बस नाम तुम्हारा ले रहा हूँ॥
कभी ना देना मुझको तुम धोखा,
तुम्हारी भक्ति का मिला पावन मौका।
मैं भक्त तुम्हारी ही भक्ति करता हूँ,
कृष्ण! तुम्हारे ही चरणों में शीश धरता हूँ॥
राम का अनुपम रूप भी तुम हो,
हरि नाम का पावन स्वरूप भी तुम हो।
करूँ तपस्या मैं सुबह और शाम,
मुझको देना प्रभु अपना ही धाम॥
हकीकत क्या है, बस आप ही जानो,
आप अन्तर्यामी हो, मेरी पुकार मानो।
प्रभु! हकीकत क्या है... मैं ना जानूँ,
मैं तो बस आपकी ही महिमा पहचानूँ॥