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क्या आप दिव्यांग हैं?

Abhishek Gupta

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            समर्थ व्यक्ति,
        
                                                    
                            
समर्थ-संसार
दिव्यांग।

हम दूरदर्शन पर देखते हैं,
समझते हैं,
हम एक दिव्यांग हैं,
एक दुर्बल को देखकर।

उनसे मिलने का विश्वास,
कभी न पूरा होने वाला,
जो इनके प्रेमी हैं,
हम उनसे पूछेंगे—
क्या आप दिव्यांग हैं?

आपका मन बड़ा-बड़ा है,
आँखों से लेकर पैरों तक,
वो निहारेगा मुझे।

फिर पूछूँगा—
आप सही बता दीजिए,
बीमार हैं?
प्यार है किसी से?
दिमाग में कुछ है?
क्या इनसे भी ऊपर,
आप दिव्यांग हैं?
वह मुख मुझसे क्या बोलेगा?
पता नहीं!
क्या परंतु?
अवश्य करेगा।

हम उससे कहेंगे—
आप मेरे प्रश्नों का उत्तर दो,
वह सोचेगा,
विचारेगा।

नहीं!
तुम कौन हो?
कोशिश मत करो सवाल करने की,
पुलिस बुला दूँगा!
पुलिस?
उसमें हम पीछे होंगे,
पुलिस?
थोड़ी कोशिश करेंगे।

हम पूछ-पूछ कर हँसा देंगे,
वह इंतज़ार करेगा हमारा,
करते हैं?
फिर हम किसी और से,
किसी को दिखलाएँगे,
यह दूरदर्शन से प्रेम करता है,
परदे के पीछे नहीं,
दृश्य से।

हम चिल्ला-चिल्लाकर कहेंगे—
समर्थ-संसार ,
शायद,
सोचेंगे।
एक दिन पहले
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