क्यूँ पूछते हो हाल मेरा दिखाने के लिए
क्यूँ हवा देते हो जखमो को जो ज़माने ने दिए
क्यूँ करते हो ज़िद ज़ख़्म ऐ दिल दिखाने के लिए
क्यूँ कहते हो ज़ख़्मो की दवा ज़ख़्मो से करने के लिए
भरी महफ़िल में कनखियों से देखें थे वो
मुख़ातिब हुए तो सिर्फ़ बहकाने के लिए
मेरी आँखों में वो तस्वीर अभी भी ताज़ा है
जिन्होंने देखा वो मंज़र सुनाने के लिए
कुछ सुखद छड़ आये तो सही, मगर
न बन सके हक़ीक़त ज़िंदगी के लिए
-अभय ‘अवधी’