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और कब एक इंसान ख़ामोश होकर भी

Aakash Gupta

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            एक शहर है मेरे अंदर,
        
                                                    
                            
जहाँ अब कोई शोर नहीं होता,
लोग आते हैं, मिलते हैं, चले जाते हैं,
मगर किसी के जाने का अब कोई ज़िक्र नहीं होता।

यहाँ हर रास्ता ख़ामोश है,
हर मोड़ पर कुछ अधूरी बातें मिलती हैं,
कुछ चेहरे याद बनकर रह गए,
कुछ यादें बिना चेहरे के भी मिलती हैं।

कभी इस शहर में हँसी गूँजती थी,
हर शाम में एक रौनक हुआ करती थी,
अब वही शामें चुपचाप ढल जाती हैं,
जिनमें कभी ज़िंदगी बसा करती थी।

अब किसी से शिकायत नहीं होती,
ना किसी से कोई सवाल करता हूँ,
जो समझना चाहे, समझ ले मुझे,
मैं अब ख़ुद को भी कहाँ बयां करता हूँ।

लोग कहते हैं, “तुम बदल गए हो,”
काश उन्हें बता पाता कि बदला क्या है…
पहले दिल हर बात कह दिया करता था,
अब ख़ामोशी में ही सब सह लिया करता है।

भीड़ में रहकर भी अकेला हूँ,
और अकेले रहकर भी ख़ुद से बातें करता हूँ,
अब किसी के समझने का इंतज़ार नहीं,
मैं अपनी ख़ामोशी को ही अपना साथी मानता हूँ।

शायद यही मेरा शहर है—
जहाँ आवाज़ें कम और एहसास ज़्यादा हैं,
जहाँ लोग तो बहुत हैं,
मगर अपनेपन के रास्ते थोड़े ख़ाली हैं।

मैं रहता हूँ इसी शहर में आज भी,
बस अब किसी को ख़बर नहीं होती…
कब आँखें नम होती हैं,
कब दिल कुछ कहता है,
और कब एक इंसान ख़ामोश होकर भी
अपने अंदर पूरा शहर समेटे होता है। 

 
एक महीने पहले
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