ऐसा लग रहा है जैसे कोई तमाशा हो रहा है,
के मुखौटा पहने चल रहे है सब शान से,
क्या पता हमे की कौन अपने गम छिपाए मुंहदिम रहा है,
इंसानियत हो रही है कज़ा हमसे,
हमारे अंदर का इंसान हम ही से खो रहा है,
और मुन्तज़िर हूँ मैं उस शख्स जो इंसानियत को बचाने का बोझ ढो रहा हैं,
मिले वो अगर तो कहना उससे कि सांझा करे हमसे भी बोझ थोड़ा,
क्योंकि ऐसा लग रहा है जैसे कोई तमाशा हो रहा है।