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बहना फूली नहीं समाई

आचार्य प्रवेश कुमार धानका

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                            ‘बहना फूली नहीं समाई‘
        
                                                    
                            

आया राखी का त्योहार,
हो गई खुशियों की भरमार।
जब भाई की सजी कलाई,
बहना फूली नहीं समाई, बहना फूली नहीं समाई।

माथे पर रोली और चंदन,
करती बहना भाव से वंदन
खुशियों से घर-आँगन महकाई,
बहना फूली नहीं समाई, बहना फूली नहीं समाई।

रेशम की डोरी से बाँधा,
पावन-निर्मल प्यार अगाधा।
मीठी-मीठी खिला मिठाई,
बहना फूली नहीं समाई, बहना फूली नहीं समाई।

माँग दुआएँ लंबी उम्र की,
माँगे मुक्ति हर संकट की।
रक्षा का वचन भाई से पाई,
बहना फूली नहीं समाई, बहना फूली नहीं समाई।

बचपन की यादें मुसकाईं,
घर-आँगन में खुशियाँ छाईं।
नेह-समर्पण की रीत निभाई,
बहना फूली नहीं समाई, बहना फूली नहीं समाई।

जन्म-जन्म का रिश्ता प्यारा,
सदा चमकता बनकर तारा।
प्रेम की पावन बयार बहाई,
बहना फूली नहीं समाई, बहना फूली नहीं समाई।
-आचार्य प्रवेश कुमार धानका
 
एक महीने पहले
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