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बिकाऊ इंसानियत

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Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                             इंसानियत की ज्योति से प्रकाशमान इस धरती पर ,
        
                                                    
                            
हर एक प्राणी भटक रहा है माया के ही दर बदर।
समझदार मानव को देखो ईमान अपना बेच रहा,
दम तोड़ रही है मानवता अधर्म रूपी चौखट पर।।

 एकता की झंकार से छम छम करती वसुंधरा पर ,
अधर्म का झंडा लहर रहा ईमान की अंतिम शय्या पर।
माया रूपी जाल में फंसकर छोड़ दिया मां बाप को ,
धरती बाटी सागर बाटा... अब मत बांटो इंसान को।।

 हरे भरे वृक्षों की चुनरी ओढ़ी हुई इस धरती मां को ,
हर लिया इन भ्रष्टों ने बेचकर अपने ईमान को।
कुछ स्वार्थ बहाने असुरो ने इस चुनरी को नष्ट किया ,
हरियाली की चुनर से वीरो ढक दो इस संसार को।।

 दुनिया में एक भारत है जहां गाय को पूजा जाता था ,
क्रूर असुर से प्राणी आज हर पशु को मार रहा।
इंसानों का जमीर बिक गया लोभ के बाजार में,
श्रद्धा रख लो महा..वीरों जियो और जीने दो में ।।

 भारत के हर युवा पर वीरों सा सेहरा सजता था ,
आज के युवा वर्ग तो देखो नशे का नर्क भोग रहा।
आदी हो गया युवा आज शराब और मोबाइल का
जागो देश के नौजवानों श्रृंगार करो तुम वीरों का ।।

 जिस देश में, मां सरस्वती का, वंदन हर पल होता था ,
उस देश में विद्या की देवी पर माया का कीचड़ उछल रहा।
क्यों वर्तमान का यह मानव विद्या को धन से बेच रहा ?
हे भारत के सभ्य जनों अब दीप जला दो ज्ञान का ।।

 काले गोरे का भेद नहीं हर दिल से दिल का नाता था,
आज का सभ्य मानव देखो एकल परिवार अपना रहा।
क्या... है ऐसी मजबूरी जो अपनों को नकार रहा,
छोड़ो यह माया का पलना बन जाओ मोती की माला ।।

 इंसानियत का हाथ थाम के मणिकांचन बनना है,
छोड़ो यह माया का पलना सबका विकास करना है।
क्यों करते हो तेरा मेरा प्रेम की ज्योत जलाओ सखा ,
मानवता के दीपक से हर घर को रोशन करना है।।
-अग्रसेन जैन 
2 महीने पहले
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