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गंगा दोहावली

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Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                             छूते मन *केकी* भयौ, गंगा की जल धार।
        
                                                    
                            
मिटे कलुष अंतर बसे, जागे हरि विस्तार॥

 पावन नीर *तुहार* मां, जीवन सांचा खोल।
डूबत ही यह जीव सब, पावत निज अनमोल॥

.हर-हर गंगे बोलते, हर-हर शंभु महेश।
नाम तुम्हारा लेत ही, कष्ट न भव के शेष॥

रम्य तटों पर बैठकर, संत जपैं हरि नाम।
लहर-लहर में देखते, शंकर जी का धाम॥

कोयल कूजै आम तरु, मधुर सुरीली तान।
सुप्त हृदय वीणा जगे, उठे भक्ति का गान॥

माया बंधन टूटते, निर्मल होत विचार।
सूरज की इक किरन ही, दूर करे अँधियार॥

दीप जलें जब सांझ को, लहरों पर मुस्कान।
झिलमिल-झिलमिल ज्योति से, ज्योतिर्मय हो ज्ञान॥

शीतल मंद बयार भी, छू ले तन-मन-प्राण।
मन के दरवाजे खुलें, पायें सभी निदान॥

शिवलिंग सम्मुख साक्षी, गूँजे हर-हर तान।
अंत समय अधरों रहे, शिव-शिव का शुभ गान॥

महादेव अरु गंग के, हर-हर के उद्घोष।
कृपा पा मिट जाएँगे, जीवन भर के दोष॥

 चंचल चिड़ियाँ बोलतीं, कच्छप धीमी चाल।
तेरे तट की छाँह माँ, करती मन खुशहाल॥

.शांति आपकी गजब है, हरती तीनों ताप।
चरणों में जो बैठता, होता प्रबल प्रताप॥

 अंतिम इच्छा एक ही, छूटें जब यह प्राण।
तेरे तट शिव नाम ले, होवे मेरा त्राण॥

शिवलिंग सम्मुख साक्षी, गूँजे हर-हर तान।
अंत समय अधरों रहे, शिव-शिव का शुभ गान॥

महादेव अरु गंग के, हर-हर के उद्घोष।
कृपा पा मिट जाएँगे, जीवन भर के दोष॥

 
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