अगर हम कहें और वो मुस्कुरा दें
हम उन के लिए ज़िंदगानी लुटा दें
हर इक मोड़ पर हम ग़मों को सज़ा दें
चलो ज़िंदगी को मोहब्बत बना दें
अगर ख़ुद को भूले तो कुछ भी न भूले
कि चाहत में उन की ख़ुदा को भुला दें
सुदर्शन फ़ाकिर प्यार के एहसास को इस शिद्दत से बयां करते हैं। बहुत ही सीधे सरल शब्दों में जज़्बातों को बयां करने का हुनर उन्हें एक विशिष्ट शायर का दर्जा देता है। उनकी ग़ज़लों को सुनकर हर शख़्स को लगता है कि ये उसका ख़ुद का एहसास-ए-बयां है भले ही उसे उर्दू भाषा न आती हो। वे पूर्वी पंजाब के उन चुनिंदा उर्दू शायरों में शुमार हैं जो मुसलमान नहीं हैं। दुनियाभर के करोड़ों ग़ज़ल प्रेमियों को अपनी रचनाओं से दीवाना बनाने वाले सुदर्शन फ़ाकिर ने मोहब्बत, ज़िंदगी और उदासी को नए मायने दिए।
मेरा क़ातिल ही मेरा मुंसिफ़ है
क्या मिरे हक़ में फ़ैसला देगा
हमसे पूछो दोस्ती का सिला
दुश्मनों का भी दिल हिला देगा
इश्क़ का ज़हर पी लिया 'फ़ाकिर'
अब मसीहा भी क्या दवा देगा
प्यार एक इंसानी गुण है और सुदर्शन में भी ये एहसास बचपन से रचा बसा था। वाणी प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तक 'कॉमरेड मोनालिज़ा तथा अन्य संस्मरण' में मशहूर साहित्यकार रविंद्र कालिया ने सुदर्शन फ़ाकिर की शख़्सियत को बयां किया है। कालिया जी लिखते हैं, "सुदर्शन फ़ाकिर इश्क़ में नाकाम हो कर सदा के लिए फिरोजपुर छोड़ कर जालंधर चला आया था और उसने एम.ए. (राजनीति शास्त्र) में दाखिला ले लिया था। बाद में, बहुत बाद में अपने अंतिम समय में बेग़म अख़्तर ने फ़ाकिर की ही सबसे अधिक गजलें गाईं। उसकी एक ग़ज़ल 'हम तो समझे थे बरसात में बरसेगी शराब, आई बरसात तो बरसात ने दिल तोड़ दिया' ग़ज़ल प्रेमियों में बहुत लोकप्रिय हुई। बेग़म जब पाकिस्तान गईं तो फ़ैज अहमद 'फ़ैज' ने फ़ाकिर की लिखी हुई ठुमरी 'देखा देखी बलम होई जाय' उनसे दसियों बार सुनी थी। मगर मैं तो उस फ़ाकिर की बात कर रहा हूं, जो इश्क में नाकाम हो कर जालंधर चला आया था और शायरी और शराब में आकंठ डूब गया था।
जालंधर आ कर वह फ़कीरों की तरह रहने लगा। उसने दाढ़ी बढ़ा ली थी और शायरों का लिबास पहन लिया था। उसका कमरा भी देखने लायक था। एक बड़ा हालनुमा कमरा था, उसमें फर्नीचर के नाम पर सिर्फ़ दरी बिछी हुई थी। बीच-बीच में कई जगह दरी सिगरेट से जली हुई थी। अलग-अलग आकार की शराब की खाली बोतलें पूरे कमरे में बिखरी पड़ी थीं, पूरा कमरा जैसे ऐशट्रे में तब्दील हो गया था। फ़ाकिर का कोई शागिर्द हफ़्ते में एकाध बार झाड़ू लगा देता था। कमरे के ठीक नीचे एक ढाबा था। कोई भी घंटी बजा कर कुछ भी मँगवा सकता था। देखते-देखते फ़ाकिर का यह दौलतखाना पंजाब के उर्दू, हिंदी और पंजाबी लेखकों का मरकज़ बन गया। अगर कोई कॉफी हाउस में न मिलता तो यहाँ अवश्य मिल जाता। दिन भर चाय के दौर चलते और मूँगफली का नाश्ता। अव्वल तो फ़ाकिर को एकांत नहीं मिलता था, मिलता तो 'दीवाने ग़ालिब' में रखे अपनी प्रेमिका के विवाह के निमंत्रण-पत्र को टकटकी लगा कर घूरता रहता। इस एक पत्र ने उसकी जिंदगी का रुख पलट दिया था।"
तेरी आँखों में हम ने क्या देखा
कभी क़ातिल कभी ख़ुदा देखा
मोहब्बत के ज़ख़्म घाव बन गए और शायरी की शक्ल में रिस रहे थे
सुदर्शन फ़ाकिर और जगजीत सिंह
सुदर्शन इश्क़ में चोट खाए हुए थे। मोहब्बत में मिला ज़ख़्म घाव बन गया था शायरी की शक्ल में रिस रहा था। उनकी इस ग़ज़ल को 'मल्लिका-ए-ग़ज़ल' बेग़म अख़्तर ने गाया और मशहूर कर दिया,
कुछ तो दुनिया की इनायात ने दिल तोड़ दिया
और कुछ तल्ख़ी-ए-हालात ने दिल तोड़ दिया
हम तो समझे थे के बरसात में बरसेगी शराब
आई बरसात तो बरसात ने दिल तोड़ दिया
दिल तो रोता रहे ओर आँख से आँसू न बहे
इश्क़ की ऐसी रिवायात ने दिल तोड़ दिया
वो मिरे हैं मुझे मिल जाएँगे आ जाएँगे
ऐसे बेकार ख़यालात ने दिल तोड़ दिया
आप को प्यार है मुझ से कि नहीं है मुझ से
जाने क्यूँ ऐसे सवालात ने दिल तोड़ दिया
सुदर्शन फाक़िर पूर्वी पंजाब के फिरोजपुर में 1934 में पैदा हुए। जालंधर के डीएवी कॉलेज से बीए फिर पॉलिटिकल साइंस और इंग्लिश में एमए किया। उन्हें कॉलेज के दिनों से ही ड्रामा और कविता का शौक़ था। अपनी युवावस्था में ही उन्होंने मोहन राकेश के नाटक 'आषाड़ का एक दिन' का निर्देशन और मंचन किया। जालंधर में कुछ दिनों तक उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो में काम किया। लेकिन ये उनका मकाम नहीं था। अभी पूरी दुनिया को उनकी शायरी से रू-ब-रू होना था। वे बंबई चले गए और दिग्गज संगीतकारों के साथ कई एलबम निकाले।
अस्सी के दशक में जगजीत सिंह और चित्रा सिंह के लगभग हर एलबम में सुदर्शन फ़ाकिर की लिखी ग़ज़लें होती थीं।
पत्थर के ख़ुदा पत्थर के सनम पत्थर के ही इंसाँ पाए हैं
तुम शहर-ए-मोहब्बत कहते हो हम जान बचा कर आए हैं
बुत-ख़ाना समझते हो जिस को पूछो न वहाँ क्या हालत है
हम लोग वहीं से लौटे हैं बस शुक्र करो लौट आए हैं
फ़ाकिर ने संगीतकार जयदेव के लिए बहुत सी ग़ज़लें लिखीं। फ़िल्म 'दूरियां' में भूपिंदर और अनुराधा पौडवाल की आवाज़ में गाया गीत 'ज़िंदगी ज़िंदगी मेरे घर आना, आना ज़िंदगी' बहुत फ़िल्म की तरह बहुत कामयाब रहा।
ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो
भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी
मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन
वो काग़ज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी
जगजीत सिंह की आवाज़ में गायी गई ये ग़ज़ल फ़िल्म 'आज' में इस्तेमाल की गई।
कई जगहों पर ये दावा किया गया है कि देशभर में एनसीसी में गाया जाने वाला गीत 'हम सब भारतीय हैं' सुदर्शन फ़ाकिर का ही लिखा हुआ है। फ़ाकिर का काव्य शिल्प बहुत असरदार है। किसी गूढ़ बात को सीधे और सरल अल्फाज़ों में व्यक्त करना तो कोई फ़ाकिर से सीखे। ज़िंदगी के ग़मों से घबराकर ज़िंदगी को ढोने पर वे करारा व्यंग करते हैं और जीने को जीने पर यकीन रखते हैं,
किसी रंजिश को हवा दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी
मुझ को एहसास दिला दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी
मेरे रुकते ही मिरी साँसें भी रुक जाएँगी
फ़ासले और बढ़ा दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी
ज़हर पीने की तो आदत थी ज़माने वालो
अब कोई और दवा दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी
चलती राहों में यूँही आँख लगी है 'फ़ाकिर'
भीड़ लोगों की हटा दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी
फ़ाकिर का 73 साल की उम्र में जालंधर में 19 फरवरी 2008 को निधन हुआ। फ़ाकिर अपनी शायरी के लिए जीते थे और उन्हें बेहतर बनाने के लिए बहुत मेहनत करते थे। जब वे मशहूर हो गए तब उनकी लिखी हुई शायरियां का संकलन 'दीवान' के नाम से प्रकाशित हुआ।
उनके शेर दुनियावी चीज़ों से इतर इंसान को महत्व देते हैं।
सामने है जो उसे लोग बुरा कहते हैं
जिस को देखा ही नहीं उस को ख़ुदा कहते हैं
फ़ाकिर की शायरी में बचपन की यादे हैं, जवानी के प्यार भरे जज़्बात हैं, समाज की संवेदनशीलता भी है,
आज के दौर में ऐ दोस्त ये मंज़र क्यूं है
ज़ख़्म हर सर पे हर इक हाथ में पत्थर क्यूं है
जब हक़ीक़त है के हर ज़र्रे में तू रहता है
फिर ज़मीं पर कहीं मस्जिद कहीं मंदिर क्यूं है
अपना अंजाम तो मालूम है सब को फिर भी
अपनी नज़रों में हर इंसान सिकंदर क्यूं है
जिंदगी जीने के क़ाबिल ही नहीं अब 'फ़ाकिर'
वर्ना हर आंख में अश्कों का समंदरर क्यूं है
फ़ाकिर अपनी शायरी से सीधे दिलों में उतरे और ताउम्र वहां मौजूद रहेंगे।
जगजीत सिंह और चित्रा सिंह की आवाज़ में उनकी ब्लॉग में मौजदू सुदर्शन फ़ाकिर की ये ग़ज़ल आपकी नज़र,
9 वर्ष पहले