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किस्सा मजेदार : जब फ़िराक़ गोरखपुरी के इस जवाब पर हरिशंकर परसाई हो गए थे नर्वस

राकेश मिश्र

Main Inka Mureed
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                                                  ‘कुछ और भी तो हो इन इशारात के सिवा
यह सब तो ए निगाहें करम बात बात बात 
इक उमर कट गई है, तेरे इंतजार में
ऐसे भी हैं कि कट न सकी जिनसे एक रात
अजीबतरीन तो इतना है कि 
दिल ही में कोई रह-रह के झिझक उठता है 
सुनते हैं इश्क़ ज़माने में है बदनाम बहुत 
आ ही जाती है मगर फिर भी मिटे दर्द की याद 
गरचे है तर्के मुहब्बत में भी आराम बहुत' 


फ़िराक साहब नयेपन के बडे़ मुरीद हैं । पुराने ढर्रे-ढब से ही नहीं अपने ही ज़माने में चल रहे फैशन से भी अपने आपको बचाना उनकी ख़ास अदा रही है ।

इक जानी हुई दुनिया इक आलमे हैरत है 
इन दोनों का मिल जाना दुनियाए मुहब्बत है 


फ़िराक़ जब यह शेर फरमाते हैं, तो बहुत ही पुरज़ोर लफ़्ज़ों में अपनी ग़ज़लों को किसी आसमानी ताक़त और ग़ैर दुनियावी मामलों से जोड़कर देखने से बरजते हैं। उनके मुताबिक़ ये ग़ज़लें वही या इल्हाम नहीं हैं। ख़ुदा या ज़िब्रील से इनका कोई ताल्लुक़ नहीं । न अर्श व कुद्श (पवित्रता) से इसका कोई वास्ता है। उनके हिसाब से उनकी 'ग़ज़लें’ इस मानूस तरीन व अजीबतरीन दुनिया-ए मुहब्बत के कुछ अधसुने राग हैं। 
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फ़िराक़ लिखते हैं, "शायरी में मेरी कोशिश रही है कि इस इन्तहात पज़ीर दौर के असरात से जहाँ तक मुमकिन हो सके बचूँ जिसमें उर्दू शायरी ने आँखें खोली और जिसमें बह अब से कुछ दिन पहले तक साँस लेती रही।" यह नयापन ही फ़िराक़ से यह कहलवाता है - 

पैदा करे ज़मीन नई आसमान नया 
इतना तो ले कोई असरे दौरे कायनात 
अहले रज़ा में शाने बग़ावत भी हो ज़़रा 
इतनी भी ज़िंदगी न हो पाबन्दे रस्मियात 


लेकिन यह नयापन क्या ? क्या फ़क़त कहने के लहज़े से ही नयापन लाया जा सकता है?  शायद नहीं। और फ़िराक़ साहब के यहाँ नयापन बहुत बड़े मक़सद के साथ मौजूद था । वे हिंदुस्तान की शायरी में हिन्दुस्तानियत के बहुत बड़े पैरोकार थे।

उनके अनुसार फ़ारसी अरबी शायरी के अदब से थोड़ा बहुत मुतास्सिर हो लेना और बात है, लेकिन शायरी हिन्दुस्तान की और उसकी जडे़ं और बुनियादें मक्के मदीने या शीराज़ में, यह मेरे गले नहीं उतरती। वे चाहते थे कि उर्दू अरब व शायरी में हिंदुस्तानियत और बुलंदतरीन हिन्दुस्तानियत इसी तरह कूट-कूट कर भर दी जाय जैसे जर्मन अदब में जर्मानियत रुसी अदब में रुसियत और टैगोर की शायरी में और प्रेमचंद के अदब में हिंदुस्तानियत। 

यह हिंदुस्तानियत कई रुपों में फ़िराक़ से यहाँ फूटता है, अपनी परम्परा प्रतीक और यहाँ तक कि मुहावरों में भी - 

दुनिया-दुनिया इश्क़ की दुनिया 
काफ़िला है या शिव की बारात 
अपना देस भी अब है बिदेस 
अपनी ख़बर भी दूर की बात 
मान न मान तेरा मेहमान 
सुन ऐ इश्क हुस्न की बात 


कहीं कहीं तो फिराक़ साहब ने अपनी ग़ज़लों में भी ऐसी भाषा का प्रयोग किया है कि उसे हिंदी कविता से अलग करना मुश्किल है - 

प्रेम कामिनी रस की पतली 
भीतर ठंडक बाहर आग 
कोमल मृदुल गात यूँ जैसे 
सहज सुभाव प्रेम बेलाग 
फिल मिल फिल तेरा रूप 
जगमग-जगमग तेरा सुहाग 
आँख के अँधे गाँठ के पूरे 
क्या कहना ऐसों के माग 

 

शायरी में हिंदुस्तान की ख़ालिस धमक हमें पहले पहल मीर में सुनाई पड़ती है। यहाँ आश्चर्य नहीं कि फिराक़ साहब अपने कई अशआर में मीर से बोलते-बतियाते या उनके शेर को बढ़ाते से दिखते हैं - 

पौ फटने का आज क्या सुहाना समाँ
पिछले को फ़िराक़ कौन दुनिया से उठा 


उर्दू के मशहूर आलोचक जानकी प्रसाद शर्मा तो यह मानते ही हैं कि ‘मीर जैसी भावों की व्यापकता और गहराई तथा भाषा का सहज औदात्य अगर किसी में है तो वे फ़िराक़ ही हैं।’ ख़ुद फ़िराक़ ने ही कहा - 

इक दर्द भरी आवाज़ नई फिर ब़ज्मे सुखन को रुलाती है 
यह तर्ज फ़िराक़ से फिर निकली, कोई कह दे तर्जे मीर नहीं 

लेकिन हैरत है कि प्रेम और सौंदर्य के तीव्र बोध का यह शायर अपने जानने वालों में अपनी शायरी से ज़्यादा अपनी सनक, हेकड़ी और बदमगज़ी के लिये जाना जाता है। जबकि उनकी शायरी की बात चलने पर समकालीन शायरों में शायद ही कोई ऐसा हो जो उनका ज़िक्र चलने पर अपने हाथों को कानों से न लगाये। यह कहना शायद बहुत ग़लत नहीं होगा कि फ़िराक़ आधुनिक शायरी के आख़िरी शास्त्रीय (क्लासिक) शायर थे। 

फ़िराक़ साहब मानते थे कि बड़ा अदब बड़े ज़माने में पैदा होता है और वे अपने आपको बड़े ज़माने की पैदाइश मानते थे। यह ठीक है कि अपनी  शायरी में उन्होंने तरक़्क़ीपसंदों की तरह वाही तबाही नहीं मनाई लेकिन अपनी सोच में वे अपने समकालीनों से कहीं बहुत आगे और साफ़ थे।

इतने साफ़ और बेलाग थे कि उन्हें अपनी परम्परा की प्रगतिशीलता को समझने और उसपर अपनी बेबाक राय रखने में कोई गुरेज़ नहीं था। 

अब हिंन्दुस्तान बदल चला है, शायरी में ही नहीं बल्कि पढ़ने वालों और सुनने वालों में अब ऐसों की अक्सरियत नहीं रही जो ग़ालिब पर ज़ौक को तरज़ीह दें या जो दाग़ की चटपटी सलोनी शायरी के चटखारे लेते हुए भी उसे रूह भी ग़िजा मान लें। 

ऐसा बेवाक शायर ही यह कह सकता था कि - 

आने वाली नस्लें तुम पर फ़ख़्र करेंगी हम-असरो
जब भी उन को ध्यान आएगा तुम ने 'फ़िराक़' को देखा है


फ़िराक़ जिनसे रश्क करने के लिए कह रहे हैं ऐसे एक दो लोगों से मैं भी वाबस्ता रहा हूँ। बी.ए. के दिनों मे फ़िराक़ साहब के छात्र रहे मशहूर इतिहासकार मुज़ीब रिज़वी वर्धा में कुछ समय तक हमारे भी अध्यापक रहे थे।

उनके पास फ़िराक़ साहब को हज़ारों क़िस्से थे। उनमें से एक क़िस्सा यह है कि फ़िराक़ साहब अपने अध्यापक कक्ष में हमेशा शेक्सपीयर को किसी न किसी बात पर लानत भेजते थे कि उसने ऐसा कहा है, उसने वैसा कहा है। 

फ़िराक़ के एक साथी  प्रोफेसर, जो एक बंगाली सज्जन थे और शेक्सपीयर के विशेषज्ञ समझे जाते थे, ने एक दिन हिम्मत करके आजिज़ी से कहा, "फ़िराक़ साहब! मैंने शेक्सपीयर का एक-एक हर्फ़ पढ़ रखा है, लेकिन जिस बात का जिक्र आप कर रहे हैं, वह तो शेक्यपीयर ने कहीं नहीं लिखा है।"

फ़िराक़ साहब यह सुनकर थोड़ी देर तक तो चुप रहे लेकिन फिर निहायत संजीदगी से कहा, "यदि शेक्यपीयर ने ऐसा नहीं कहा है तो उसे कहना चाहिये था।" 

रश्क किये जाने वालों में से एक और शख़्स हमारे पूर्व कुलपति और उपन्यासकार विभूतिनारायण राय हैं जिन्होंने बारहा फ़िराक़ को देखा और जाना था। उन्होंने बताया था कि एक बार वे हरिशंकर परसाई के साथ फ़िराक़ साहब के बंगले के सामने से गुज़र रहे थे, तो परसाई जी फ़िराक़ साहब से मिलने को मचल उठे।

गेट खोलकर जब वे लोग लॉन में पहुँचे तो वहाँ फ़िराक़ साहब हस्बमामूल तरीके से बैठे हुए शराब पी रहे थे। परसाई जी ने हुलसकर अपना परिचय दिया मैं हरिशंकर परसाई हूँ। फ़िराक़ साहब ने अपनी नज़रें तक नहीं उठाई। परसाई जी का आत्मविश्वास जबाब दे रहा था। 

परसाई जी ने फिर कहा- जनाब, मैंने आपकी सारी अच्छी ग़ज़लें पढ़ रखी हैं। इस बार फ़िराक़ साहब ने अपनी नज़रें थोड़ी ऊपर की और बड़ी ही तुर्श आवाज़ में कहा- क्यों ? मैनें कोई ख़राब ग़ज़ल भी कही है क्या?

राय साहब बताते हैं कि उन्होंने परसाई जी को उतना नर्वस पहले कभी नहीं देखा था। 

लेकिन फ़िराक़ साहब तो शायद यही सेाच रहे होंगे - 

फ़िराक़ गम भी मेरा है हरीफे़-ज़िंदादिली 
फ़सुर्दगी में भी यारों को छेड़ सकता हूँ 


(लेखक अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं और हिंदी कहानियों के चर्चित नाम हैं।)
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