साहित्य में स्त्री एक ऐसा शब्द है जिस पर विचार मंथन हर काल में किया गया है। स्त्रियों के सशक्तिकरण पर हिंदी कविता जगत में महिलाओं पर लिखे कई भावों को एक ही जगह रखने की कोशिश की है।
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तुम जानते थे
स्त्री के भीतर रहती है
नन्ही, मासूम, भोली चिड़िया
भरम जाती है
जादुई बातों से
परचा सकते हैं जिसे
रोज़-रोज़ बिखेरे गये
प्यार के दानें।
जानते थे तुम
सशंकित रहती है प्रलोभनों से
चिड़िया
भरम जाती है अन्ततः
जानते थे
आसान होगा
पंख खोलती चिड़िया को पा लेना
और बहुत ही आसान होगा
पंख मरोड़कर चल देना
क्या पौरूष
सिर्फ छलना भर है?
किसने कहा था
खूंटा जो गड़ा है
उससे बंधी रस्सी के एक सिरे पर
कसकर गांठ बांध दो
दूसरे सिरे के गोल घेरे में
अपनी गरदन डाल दो
रस्सी तुड़ाकर भागो
लेकिन बार-बार वापस आ
उसी के आसपास घूमती रहो
कहना किसे है-ऐसे में
जब खुद अपनी ही कैद में
गिरफ्त हो ‘मैं’!
खामोश रहने वाली
लड़कियों की हंसी में
कोई जादू नहीं होता
हंसी में निकलते हैं
खामोशी के अवसाद
इसलिए
खामोश रहने वाली लड़कियां
खुलकर हंसती हैं
अवसादों से मुक्त होती लड़कियां सचमुच
खूबसूरत दिखती हैं!
यह स्त्री
सब कुछ जानती है
पिंजरे के बारे में
जाल के बारे में
यंत्रणागृहों के बारे में।
उससे पूछो
पिंजरे के बारे में पूछो
वह बताती है
नीले अनन्त विस्तार में
उड़ने के
रोमांच के बारे में।
जाल के बारे में पूछने पर
गहरे समुद्र में
खो जाने के
सपने के बारे में
बातें करने लगती है।
यंत्रणागृहों की बात छिड़ते ही
गाने लगती है
प्यार के बारे में एक गीत।
रहस्यमय हैं इस स्त्री की उलटबासियाँ
इन्हें समझो,
इस स्त्री से डरो।
जब अजनबी थे हम
तुमने मुझे जानना चाहा
मैंने भी हंसकर
अपने बारे में तुम्हें बताया
हम दोस्त बने
जब तुमने दोस्ती का हाथ बढ़ाया
फिर तुमने मुझे प्रेमिका कहा
जब मैंने प्रेम में अपना सर्वस्व समर्पण कर दिया
तो सबसे पहले
तुमने ही मुझे
बनाया ‘वेश्या’!