हिन्दी के सुप्रसिद्ध कवि और हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष विष्णु खरे अब हमारे बीच नहीं रहे। उनका निधन साहित्य जगत में एक अपूरणीय क्षति है। अपने विशद अध्ययन और विपुल साहित्य से हिंदी जगत को अनमोल संपदा देने वाले खरे की ये हैं 5 प्रमुुख कविताएं...
कहो तो डरो...
कहो तो डरो कि हाय यह क्यों कह दिया
न कहो तो डरो कि पूछेंगे चुप क्यों हो
सुनो तो डरो कि अपना कान क्यों दिया
न सुनो तो डरो कि सुनना लाजिमी तो नहीं था
देखो तो डरो कि एक दिन तुम पर भी यह न हो
न देखो तो डरो कि गवाही में बयान क्या दोगे
सोचो तो डरो कि वह चेहरे पर न झलक आया हो
न सोचो तो डरो कि सोचने को कुछ दे न दें
पढ़ो तो डरो कि पीछे से झाँकने वाला कौन है
न पढ़ो तो डरो कि तलाशेंगे क्या पढ़ते हो
लिखो तो डरो कि उसके कई मतलब लग सकते हैं
न लिखो तो डरो कि नई इबारत सिखाई जाएगी
डरो तो डरो कि कहेंगे डर किस बात का है
न डरो तो डरो कि हुक़्म होगा कि डर
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आईने में देखते हुए
इस तरह इतनी देर तक देखना
कि शीशा चकनाचूर हो जाये-
फिर भी इतना मुश्किल नहीं
वह शीशे में
यूँ और इतना देखना चाहता है
कि बिल्लौर में तिड़कन तक न आये
सिर्फ़ जो दिख रहा है वह पुर्जा-पुर्जा हो जाए
और जो देख रहा है वह भी
फिर भी एक अक्स बचा रहे
जिसका वह है उसे जाने कैसे देखता हुआ
उसे जहाँ छोड़ा था
कभी-कभी वहाँ जाकर खड़ा हो जाता हूँ
कूडे़ के जिस अम्बार को देख
वह लपक कर दौड़ गया था
अब वहाँ नहीं है
दरअसल अब कुछ भी वहाँ उस दिन जैसा नहीं है
मैंने उसे आधे दिल से पुकारा भी था
कि अगर लौट आए तो उसे वापस ले जाऊँ
लेकिन वह सिर्फ़ एक बार मेरी तरफ़ देख कर
मुझे ऐसा लगा कि जैसे हँसता हुआ
कूड़ा खोदने में जुटा रहा
उसके बाद मैं चला आया लेकिन कई बार लौटा हूँ
वह जगह अब एकदम बदल चुकी है
नई इमारतों दूकानों की वजह से पहचानी नहीं जाती
वह कूड़ा भी नहीं रहा वहाँ
वह सड़क अंदर जहाँ जाती थी
उस पर भी कुछ दूर तक गया हूँ
वह या उससे मिलता-जुलता कुछ भी दिखाई नहीं देता
कभी कभी एकाध आदमी पूछ लेता है
किसे देखते हैं भाई साहब
नहीं यूँ ही या कोई और झूठ बोल कर चला आता हूँ
कई कारणों से वहाँ जाना कम होता गया है
और अब तो बहुत ज़्यादा बरस भी हो गए
फिर भी कभी लौटता हूं सारी उम्मीदों के खिलाफ़
और जहाँ वह कूड़े का ढेर था उससे कुछ दूर
वह उतनी ही देर
याद करता खड़ा रहता हूँ कि कोई मददगार फिर पूछे नहीं
एक दिन ऐसे जाऊंगा कि कोई मुझे देख नहीं पाएगा
और बिना पुकारे पता नहीं कहाँ से
वह झपटता हुआ तीर की तरह आएगा
पहचानता हुआ मुझे अपने साथ ले जाने के लिए
साथ का आख़िर यह भी कैसा मकाम
कि आलिंगन और चुम्बन तक से अटपटा लगने लगे
ऐसे और बाक़ी शब्द भी अतिशयोक्ति मालूम हों
इसलिए उन्हें एकांत किसी जगह पर भी
महज एक-दूसरे के हाथ छूते हुए से बैठना होगा
सामने से गुज़रने वाले इक्का-दुक्का लोगों को
यह देख कर भी कुछ अजब-सा लगेगा
जहाँ ज़रा भी कुछ अलग करना नुमाइश हो जाना है
और थोड़ी दूर से उनकी खिलखिलाहट उन तक पहुँचेगी
और शायद एक लम्हे के लिए वे एक-दूसरे को फ़कत देखेंगे
उनके हिस्से की धरती
सांझ की छाया की ओर घूम रही होगी
सूरज के डूबने का भ्रम रचती हुई
और जब चेहरे और मंजर धुंधले पड़ने लगेंगे
रात का कोई पहला पक्षी कुछ बोलना शुरू करेगा
तब वे उसी तरह चुप उठेंगे
उनके बीच वह होगा
जो न फ़ासला है न नज़दीकी सिर्फ़ संग है
शायद वह उसकी उंगलियां छोड़ चुका होगा
और नीचे देखता चल रहा होगा
जबकि वह सामने देखती होगी और घटते उजाले में
उसकी वह सोच भरी किंचित मुस्कान दिखाई नहीं देगी
इसी तरह वे वापस आएंगे अपने चौथे मंजले पर
मन ही मन गिनते पाँच दर्जन सीढ़ियाँ लगभग बिना दिक़्क़त चढ़ते हुए
और या तो वह कहेगी कितने दिन हुए तुम्हारे हाथ की चाय पिये
और वह अपने खुफ़िया नुस्ख़े से उसे तैयार करेगा
या वह ख़ुद ही बिना कहे बना कर ले आएगी
उसकी आसूदा उसाँस उफ़ान की झुलसती आवाज़ में डूबती हुई
उनकी आंखें स्वाद रंगत और गर्माहट पर सहमत होंगी
परस्पर आख़िरी घूंट तक
डॉक्टरो मुझे और सब सलाह दो
सिर्फ़ यह न कहो कि अपने हार्ट का ख़याल रखें और
ग़ुस्सा न किया करें आप
क्योंकि ग़ुस्से के कारण आई मृत्यु मुझे स्वीकार्य है
ग़ुस्सा न करने की मौत के बजाए
बुज़ुर्गो यह न बताओ मुझे
कि मेरी उम्र बढ़ रही है और मैं एक शरीफ़ आदमी हूँ
इसलिए अपने ग़ुस्से पर काबू पाऊँ
क्योंकि जीवन की इस शाइस्ता सार्थकता का अब मैं क्या करूँगा
जो अपने क्रोध पर विजय प्राप्त कर एक पीढ़ी पहले आपने
हासिल कर ली थी
ग्रंथो मुझे अब प्रवचन न दो
कि मनुष्य को क्रोध नहीं करना चाहिए
न गिनाओ मेरे सामने वे पातक और नरक
जिन्हे क्रोधी आदमी अर्जित करता है
क्योंकि इहलोक में जो कुछ नारकीय और पापिष्ठ है
वह कम से कम सिर्फ़ ग़ुस्सैल लोगों ने तो नहीं रचा है
ठंडे दिल और दिमाग़ से यह मुझे दिख चुका है
ताकतवर लोगो मुझे शालीन और संयत भाषा में
परामर्श न दो कि ग़ुस्सा न करो
क्योंकि उससे मेरा ही नुकसान होगा
मैं तुम्हारे धीरोदात्त उपदेश में लिपटी चेतावनी सुन रहा हूँ
लेकिन सब कुछ चले जाने के बाद
यही एक चीज़ अपनी बचने दी गई है
डॉक्टर तो सदाशय हैं भले-बुरे से ऊपर
लेकिन बुज़ुर्गो ग्रंथो ताकतवर लोगो
मैं जानता हूँ
आप एक शख़्श के ग़ुस्से से उतने चिंतित नहीं हैं
आपके सामने एक अंदेशा है सच्चा या झूठा
चंद लोगों के एक साथ मिलकर ग़ुस्सा होने का
साभार- कविताकोश