चले चलिए कि चलना ही दलील-ए-कामरानी है
जो थक कर बैठ जाते हैं वो मंज़िल पा नहीं सकते
~हफ़ीज़ बनारसी
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शायद मुझे निकाल कर पछता रहे हैं आप
महफ़िल में इस ख़्याल से फिर आ गया हूं मैं
~अदम
जिसके किरदार पे शैतान भी शर्मिंदा है
वो भी आये हैं यहां करने नसीहत हमको
~माजिद देवबंदी
मेरा मज़हब इश्क़ का मज़हब जिस में कोई तफ़रीक़ नहीं
मेरे हल्क़े में आते हैं 'तुलसी' भी और 'जामी' भी
~क़ैशर शमीम