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जिंदगी का करारा सच छिपा है अदम की इन पांच कविताओं में

शरद मिश्र

Kavya Charcha
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                                                  लोकप्रिय कवि अदम गोंडवी ने अपनी कविताओं में जीवन के करारे सच का बड़ी बेबाकी से वर्णन किया है।अदम ख्वाब, चांद तारे इश्क़ के आशियाने और आसमान की बातें नहीं करते हैं और ना ही इश्क़ की खुमारी भी उनकी कविताओं में है।उनकी कविताओं में भय, भूख, गरीबी और भ्रष्टाचार का बेखौफ रूप झलकता है ।       
                                                              
                  

                    
                                        
                         
                                                                                   
                            
                         
                                                            
                                
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उस युवा पीढ़ी के चेहरे की हताशा देखिये...

जिस्म क्या है रूह तक सब कुछ ख़ुलासा देखिये
आप भी इस भीड़ में घुस कर तमाशा देखिये

जो बदल सकती है इस पुलिया के मौसम का मिजाज़
उस युवा पीढ़ी के चेहरे की हताशा देखिये

जल रहा है देश यह बहला रही है क़ौम को
किस तरह अश्लील है कविता की भाषा देखिये

मतस्यगंधा फिर कोई होगी किसी ऋषि का शिकार
दूर तक फैला हुआ गहरा कुहासा देखिये

यहाँ जुम्मन के घर में आज भी फूटी रक़ाबी है...

तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है 
मगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है 

उधर जम्हूरियत का ढोल पीते जा रहे हैं वो 
इधर परदे के पीछे बर्बरीयत है ,नवाबी है 

लगी है होड़ - सी देखो अमीरी और गरीबी में 
ये गांधीवाद के ढाँचे की बुनियादी खराबी है 

तुम्हारी मेज़ चांदी की तुम्हारे जाम सोने के 
यहाँ जुम्मन के घर में आज भी फूटी रक़ाबी है

उधर लाखों में गांधी जी के चेलों की कमाई है... 

वो जिसके हाथ में छाले हैं पैरों में बिवाई है 
उसी के दम से रौनक आपके बंगले में आई है 

इधर एक दिन की आमदनी का औसत है चवन्नी का 
उधर लाखों में गांधी जी के चेलों की कमाई है 

कोई भी सिरफिरा धमका के जब चाहे जिना कर ले 
हमारा मुल्क इस माने में बुधुआ की लुगाई है 

रोटी कितनी महँगी है ये वो औरत बताएगी 
जिसने जिस्म गिरवी रख के ये क़ीमत चुकाई है
 

इस शहर को रोशनी के बाँकपन तक ले चलो...

भूख के एहसास को शेरो-सुख़न तक ले चलो
या अदब को मुफ़लिसों की अंजुमन तक ले चलो

जो ग़ज़ल माशूक के जल्वों से वाक़िफ़ हो गयी
उसको अब बेवा के माथे की शिकन तक ले चलो

मुझको नज़्मो-ज़ब्त की तालीम देना बाद में
पहले अपनी रहबरी को आचरन तक ले चलो

गंगाजल अब बूर्जुआ तहज़ीब की पहचान है
तिशनगी को वोदका के आचमन तक ले चलो

ख़ुद को ज़ख्मी कर रहे हैं ग़ैर के धिखे में लोग
इस शहर को रोशनी के बाँकपन तक ले चलो

 

अदीबों की नई पीढ़ी से मेरी ये गुज़ारिश है...

न महलों की बुलंदी से न लफ़्ज़ों के नगीने से
तमद्दुन में निखार आता है घीसू के पसीने से

कि अब मर्क़ज़ में रोटी है,मुहब्बत हाशिये पर है
उतर आई ग़ज़ल इस दौर मेंकोठी के ज़ीने से

अदब का आइना उन तंग गलियों से गुज़रता है
जहाँ बचपन सिसकता है लिपट कर माँ के सीने से

बहारे-बेकिराँ में ता-क़यामत का सफ़र ठहरा
जिसे साहिल की हसरत हो उतर जाए सफ़ीने से

अदीबों की नई पीढ़ी से मेरी ये गुज़ारिश है
सँजो कर रक्खें ‘धूमिल’ की विरासत को क़रीने से

साभार-कविताकोश
6 वर्ष पहले
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