ज़माना बड़े शौक़ से सुन रहा था
हमीं सो गए दास्तां कहते-कहते
साकिब लखनवी
ये न थी हमारी किस्मत कि विसाले-यार होता
अगर और जीते रहते यही इंतिजार होता
ग़ालिब
कुछ ऐसे सिलसिले भी चले ज़िंदगी के साथ
कड़ियां मिलीं जो उनकी तो ज़ंजीर बन गए
यूसुफ़ बहजाद
मुख़ालफ़त से मेरी शख़्सियत संवरती है
मैं दुश्मनों का बड़ा एहतेराम करता हूं
बशीर बद्र
कोई आज तक न समझा कि शबाब है तो क्या है
यही उम्र जागने की, यही नींद का ज़माना
नुसूर वाहिदी
हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले
ग़ालिब
वो आए हैं पशेमां लाश पर अब
तुझे अय ज़िंदगी लाऊं कहां से
मोमिन
उम्र सारी तो कटी इश्के-बुतां में मोमिन
आख़री वक्त में क्या ख़ाक मुसलमां होंगे
मोमिन
रोशनी जिनसे हुई दुनिया में, उनकी कब्र पर
आज इतना भी नहीं जाकर कोई रख दे चिराग़
हाफिज़
हम तुम मिले न थे तो जुदाई का था मलाल
अब ये मलाल है कि तमन्ना निकल गई
जलील मानकपुरी
कोई दम का मेहमां हूं ऐ अहले-महफ़िल
चिराग़े-सहर हूं, बुझा चाहता हूं
इक़बाल
इन्हीं पत्थरों पे चलकर अगर आ सको तो आओ
मेरे घर के रास्ते में कोई कहकशां नहीं है
मुस्तफ़ा ज़ैदी
मुझको उस वैद्य की विद्या पे तरस आता है
भूखे लोगों को जो सेहत की दवा देता है
नीरज
ख़ामोशी से मुसीबत और भी संगीन होती है,
तड़प ऐ दिल तड़पने से ज़रा तस्कीन होती है
अज्ञात
हमने माना कि तगाफुल न करोगे लेकिन
खाक हो जाएंगे हम तुमको खबर होने तक
ग़ालिब
किस तरफ जाऊं, किधर देखूं, किसे आवाज़ दूं
ऐ हुजूमे-नामुरादी जी बहुत घबराये है
अज्ञात
होशो हवास, ताबो-तबां 'दाग' जा चुके
अब हम भी जाने वाले हैं सामान तो गया
'दाग'
मौत ही इंसान की दुश्मन नहीं
ज़िंदगी भी जान लेकर जाएगी
'जोश' मलासियानी
ज़िदगी से तो क्या शिकायत हो
मौत ने भी भुला दिया है हमें
अज्ञात
जिस दिन से चला हूं मेरी मंजिल पे नज़र है
आंखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा
अज्ञात
ज़िंदगी एक फकीर की चादर
जब ढके पांव हमने, सर निकला
अज्ञात