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सांप्रदायिक सद्भाव को बयां करते हैं यह 10 बड़े शेर...

काव्य डेस्क

Kavya Charcha
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                                                  देश तनाव और सांप्रदायिक वैमनस्य की समस्या से जूझ रहा है। आए दिन सामाजिक अलगाव और जाति-धर्म की विषमता पर हिंसक खबरे सुनने को मिल रही हैं। ऐसे समय में हमें सबसे पहले अपना भाईचारा हर हाल में कायम रखना होगा। इसको संजो कर ही देश का हर व्यक्ति प्रेम और सद्भाव के रास्ते में चलता रहेगा। काव्य चर्चा सेक्‍शन के तहत हम इस बार सांप्रदायिक सद्भाव को जाहिर करने वाले उर्दृ के 10 बड़े शेर पेश कर रहे हैं।     
                                                              
                  

                    
                                        
                         
                                                                                   
                            
                         
                                                            
                                
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हफीज अपनी बोली मोहब्बत की बोली...

दुश्मनी जमकर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे
जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा न हों 
-बशीर बद्र   

हफीज अपनी बोली मोहब्बत की बोली
न उर्दृ न हिंदी न हिंदोस्तानी 
-हफीज जालंधरी

 

मुझसे बिछड़ के खुश रहते हो...

हमारा खून का रिश्ता सरहदों का नहीं 
हमारे खून में गंगा भी चनाब भी है
-कंवल जियाई 

मुझसे बिछड़ के खुश रहते हो
मेरी तरह तुम भी झूठे हो
-बशीर बद्र 

मैं तो हर वक्त मोहब्बत से भरा रहता हूं...

मुझमें थोड़ी सी भी जगह नहीं नफरत के लिए 
मैं तो हर वक्त मोहब्बत से भरा रहता हूं 
-मिर्जा अतहर जिया 

सात संदूकों में भर कर दफन कर दो नफरतें
आज इंसा को मोहब्बत की जरूरत है बहुत 
-बशीर बद्र 

 

एक हो जाएं तो बन सकते हैं खुर्शीद-ए-मुंबीं... 

यही है इबादत यही दीन ओ ईमां 
कि काम आए दुनिया में इंसा के इंसा 
-अल्ताफ हुसैन हाली 

एक हो जाएं तो बन सकते हैं खुर्शीद-ए-मुंबीं 
वर्ना इन बिखरे हुए तारों से क्या काम बने
-अब्दुल मुजाहिद जाहिद 

 

सारे जहां का दर्द हमारे जिगर में है...

खंजर चले किसी पर तड़पते हैं हम 'अमीर'
सारे जहां का दर्द हमारे जिगर में है 
-अमीर मीनाई 

किसी का कोई मर जाए हमारे घर में मातम है 
गरज बारह महीने तीस दिन हम को मोहर्रम है 
-रिन्द लखनवी
8 वर्ष पहले
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