शरद पूर्णिमा की चांदनी की शीतलता में शायरों का इश्क़ परवान चढ़ता है। चाँद शायरों की डायरी का वो पन्ना है जिस पर महबूबा की शक्ल-ओ-सीरत से लेकर रात की तन्हाई तक के किस्से लिखे जाते हैं। यह लेख़कों का वो पसंदीद बिम्ब है जिसकी प्रेरणा से उनकी कितनी ही नज़्में-ग़ज़लें सम्पूर्ण हो पाती हैं।
चाँद ख़ामोश जा रहा था कहीं
हम ने भी उस से कोई बात न की
- महमूद अयाज़
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पूछना चाँद का पता 'आज़र'
जब अकेले में रात मिल जाए
- बलवान सिंह आज़र
चाँद को तुम आवाज़ तो दे लो
एक मुसाफ़िर तन्हा तो है
- अज़ीम क़ुरैशी
हाथ में चाँद जहाँ आया मुक़द्दर चमका
सब बदल जाएगा क़िस्मत का लिखा जाम उठा
- बशीर बद्र
कल चौदवीं की रात थी शब भर रहा चर्चा तिरा
कुछ ने कहा ये चाँद है कुछ ने कहा चेहरा तिरा
- इब्ने इंशा
पूछो ज़रा ये चाँद से कैसे सहर हुई
इतनी तवील रात भी कैसे बसर हुई
- फ़रह शाहि
चाँद ख़ुद को देख कर शरमाएगा
बादलों की ओट में छुप जाएगा
- सीमा शर्मा मेरठी
वो चाँद कह के गया था कि आज निकलेगा
तो इंतज़ार में बैठा हुआ हूँ शाम से मैं
- फ़रहत एहसास
चाँद निकला तो यूँ लगा मुझ को
शब की दीवार में भी दर निकला
- इल्यास राज भट्टी