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शाद अज़ीमाबादी: ज़िंदगी की दुश्वारियों से मोहब्बत करने वाला शायर

काव्य डेस्क

Kavya Charcha
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                            'हज़ार शुक्र कि मुद्दत में यह असर आया
        
                                                    
                            
लिया जो नाम तेरा दिल में तू उतर आया' 

यह शेर ज़िंदगी को सरलता में देखने वाले 'शाद' अज़ीमाबादी का है। वह परेशनियों और तकलीफ़ों पर रोने और ग़मज़दा रहने के बजाए उनमें सहजता ढूंढ लेते थे। 1846 में पैदा हुए 'शाद' अज़ीमाबाद (पटना सिटी) के रहने वाले थे। उनका मूल नाम सैयद अली मुहम्मद था। वह एक बुलंद मर्तबे के शायर थे।

भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित शेर-ओ-सुख़न संग्रह में अयोध्याप्रसाद गोयलीय लिखते हैं, "वे ख़्वाजा मीर 'दर्द' की शिष्य परम्परा में हुए हैं। अत: आपके कलाम में भी वही असर नज़र आता है। कहीं-कहीं तत्कालीन लखनवी रंग की भी झलक मारती है। आप मीर 'अनीस' से भी काफ़ी प्रभावित नज़र आते हैं। शाद देहलवी-लखनऊ ज़बान के क़ायल नहीं थे। यही कारण है कि उनके कलाम में यत्र-तत्र मुहावरों और शब्दों का प्रयोग उक्त स्थानों की परम्परा से भिन्न हुआ है।"

अयोध्याप्रसाद लिखते हैं कि 'शाद' व्यथा पीड़ा के आंसुओं को पीने के बजाए उन्हें, प्रकट करना आवश्यक समझते हैं, 

'ख़ामोशी से मुसीबत और संगीन होती है
तड़प ऐ दिल तड़पने से ज़रा तस्कीन होती है' 

'यूं ही रातों को तड़पेंगे, यू ही जां अपनी खोयेंगे
तेरी मर्ज़ी नहीं ऐ दर्दे दिल ! अच्छा ! न सोयेंगे' 

अक्सर चुम्बन को शायरी में ऐसे पेश किया जाता है कि उसमें अश्लीलता नज़र आती है मगर शाद का अंदाज़े बयां कुछ और ही था। अयोध्याप्रदसाद लिखते हैं, "शाद के यहां 'बोसा' (चुम्बन) जैसा बदनाम और हक़ीर शब्द भी इतनी बुलंदी से नज़्म हुआ है कि अन्यत्र मिसाल नहीं मिलती। आस्ताने यार को बोसा देना 'शाद' की अछूती और उच्च भावना है - 

'ले तो लूं सोते में उसके पांव का बोसा मगर
ऐसी बातों से वह काफ़िर बदगुमां हो जाएगा' 

यार के पांव का बोसा लेना या जहां उसने पांव रखे हों, उस आस्तां का बोसा लेना ज़ाहिर में यकसां नज़र आते हैं। मगर 'शाद' के शेर में श्रद्धा, भक्ति और पवित्र-प्रेम की झलक है। ग़ज़ल इतनी नाज़ुक और कोमल कला है कि तनिक-सी चूक से वह आकाश से पृथ्वीपर गिर पड़ती है। शब्दों के हेर-फेर और भावनों के उतार-चढ़ाव से इसमें पवित्र-से-पवित्र और पतित-से-पतित विचारों का प्रतिबिम्ब झलकता है।"

अयोध्याप्रसाद लिखते हैं, नियाज़ फ़तेहपुरी के मुताबिक़ "शाद ब-लिहाज़ तग़ज़्ज़ुल बड़े मर्तबे के शायर थे। उनके यहां  मीर-ओ-दर्द का गुदाज़, मोमिन की नुक्तासंजी, ग़ालिब की बुलंद परवाज़ी और अमीर-ओ-दाग़ की सलासत सब एक ही वक़्त में ऐसी मिली-जुली नज़र आती हैं कि अब ज़माना मुश्किल से ही कोई दूसरी नज़ीर पेश कर सकेगा।" 

वो लिखते हैं, "'शाद' ख़्वाजा 'दर्द' स्कूल के स्नातक थे। आपका कलाम भी ईश्वरीय प्रेम, आध्यात्मिकता और दार्शनिकता से ओत-प्रोत है। आपका रंगे-शायरी ख़्वाजा 'आतिश' से बहुत कुछ समानता रखता है। 'आतिश' और 'शाद' दोनों ही अपने-अपने युग में बहुत बुलंद मर्तबे के शायर हुए है। दोनों के विचार, भाव और अंदाज़े-बयान मिलते-जुलते हैं। 

दोनों की अक्सर ग़ज़लें हमतरही ऐसी हैं कि अगर उनमें से उपनाम निकाल दिये जायें तो कौन ग़ज़ल किसकी है, निश्चयपूर्वक कहना आसाना नहीं। ज़ाहिर में दोनों लखनवी, किन्तु भावों और विचारों की दृष्टि से अंतरंग में देहलवी हैं। दोनों ही सूफ़ियाना विचार के हैं। इतनी समानता होते हुए भी दोनों का रंग भिन्न-भिन्न है। 'आतिश' के यहां व्यंग्य और तीखापन इस ग़ज़ब का है कि कुछ न पूछिये। उनके कलाम में गर्मी और अंदाज़े बयान में इस बला की है कि कोई भी शायर उनका हमअसर नज़र नहीं आता।"

अयोध्याप्रसाद लिखते हैं कि 'शाद' भौंरे या तितली के इश्क़ को इश्क़ नहीं समझते। वे तो जिसके हो गये, जीवनभर उसे निभाना ही सच्ची आशिक़ी समझते हैं ! मानवी प्रेम के साथ-साथ कोई ईश्वरीय प्रेम का भी दम भरे तो वह उसे कुफ़्र समझते हैं। 

शाद इश्क़ से तंग आकर मरना नहीं चाहते बल्कि वह तो उम्रे-दराज़ चाहते हैं - 

'मुझ-सा फ़क़ीर आपसे राज़ों-नियाज़ हो
या रब ! हयाते-इश्क़े-मुहब्बत दराज़ हो' 

तमाम उम्र ज़िंदगी को आसानियों का चमन बनाने की जद्दोजहद में रहे शाद अज़ीमाबादी ने 1927 में आख़िरी सांस ली।  

'हमारे ज़ख़्म-दिल ने दिल्लगी अच्छी निकाली है
छुपाये से तो छुप जाना मगर नासूर हो जाना

ख़्याले वस्ल को अब आरज़ू झूला झुलाती है
क़रीब आना दिले मायूस के फिर दूर हो जाना

शबे वस्ल अपनी आंखों ने अजब अन्धेर देखा है
नक़ाब उनका उलटना रात का काफ़ूर हो जाना'
9 वर्ष पहले
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Sanjay

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