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रवीन्द्रनाथ ठाकुर रचित नोबेल से सम्मानित 'गीतांजलि' से 3 चुनिंदा कविताएं

काव्य डेस्क

Kavya Charcha
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                                                  बांग्ला साहित्य के मूर्धन्य हस्ताक्षर रवीन्द्रनाथ ठाकुर बीसवीं शताब्दी के शुरुआती चार दशकों तक भारतीय साहित्याकाश में ध्रुवतारे की तरह चमकते रहे। 'गीतांजलि' के लिए उन्हें 1913 में नोबेल पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। पेश है 'गीतांजलि' से 3 चुनिंदा कविताएं- 


अनजानों से भी करवाया है परिचय मेरा तुमने 
जानें, कितने आवासों में छांव मुझे दिलवाया है 
दूरस्थों को भी करवाया है स्वजन समीपस्थ तुमने 
भाई बनवाए हैं मेरे अन्यों को, जानें, कितने 

छोड़ पुरातन वास कहीं जब जाता हूं मैं 
क्या जानें क्या होगा  सोचा करता हूं मैं 
नूतन बीच पुरातन हो तुम, भूल इसे मैं जाता हूं 
दूरस्थों को भी करवाया है स्वजन समीपस्थ तुमने 

जीवन और मरण में होगा अखिल भुवन में जब वो भी 
जन्म-जन्म का परिचित चिन्होगे उन सबको तुम भी 
तुम्हें जानने पर न पराया होगा कोई भी 
नहीं वर्जना होगी और न भय ही कोई भी 

जगते हो तुम मिला सभी को, ताकि दिखो सबमें ही 
दूरस्थों को भी करवाया है स्वजन समीपस्थ तुमने 
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बैठा हूं मैं, ताकि प्रेम के हाथों पकड़ा जाऊं...

बैठा हूं मैं, ताकि प्रेम के हाथों पकड़ा जाऊं 
देरी हुई बहुत मैं दोषी हूं अनेकों दोषों से 
विधि-विधान की रज्जु बांधने आती, मैं हट जाता 
उस पर जो भी दंड मिले, मैं ग्रहण समुद्र कर लूंगा 
बैठा हूं मैं, ताकि प्रेम के हाथों पकड़ा जाऊं 

लोग किया करते जो मेरी निंदा, झूठ नहीं है,
शिरोधार्य कर उन सबको मैं रहूं सभी से नीचे 
शेष हुई अब बेला, मेला रहा न क्रय-विक्रय का
आए थे, जो मुझे बुलाने वे सरोष अब लौटे 
बैठा हूं मैं, ताकि प्रेम के हाथों पकड़ा जाऊं 

प्राण सखा हे मेरे बंधु !

आज झड़ी की रात हुआ आगमन तुम्हारा है 
प्राण सखा हे मेरे बंधु !
रोता है आकाश हताश-सा 
नहीं नींद है नयनों में मेरे 
द्वार खोल कर के, हे प्रियवर !
बार-बार मैं तुम्हें निहार रहा हूं 
प्राण सखा हे मेरे बंधु !

बाहर कुछ मैं देख न पाता 
सोचा करता हूं कि किधर पथ बंधु ! तुम्हारा है 
किस सुदूर सरिता के पार 
किस दुर्गम जंगल के पास 
किस गंभीर तमिस्रा होकर 
हो जाते हो  पार, भला, तुम ?
प्राण सखा हे मेरे बंधु।।
 
4 वर्ष पहले
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