रामचन्द्र शुक्ल हिन्दी साहित्य के प्रसिद्ध आलोचक, अनुवादक, कथाकार और कवि भी थे। उनकी रचनाओं में सबसे विशिष्ट है 'हिन्दी साहित्य का इतिहास' जिससे पाठ्य-क्रम में आज भी सहायता ली जाती है। पेश हैं रामचन्द्र शुक्ल की लिखी ये 5 कविताएं
प्रकृति चित्र की छटा होत परिवर्तित ऐसी
चित्रकार की अजब अनोखी गति हैं जैसी
भई प्रकृति हैं मौन पौन हू सोवन लागी
पशु पक्षी हू मनहुँ दियो यहि जग कहँ त्यागी
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कुसुमित लतिका ललित तरुन बसि क्यों छबि छावत?
हे रसालग्न! बैरि व्यर्थ क्यों सोग बढ़ावत?
हे कोकिल! तजि भूमि नाहिं क्यों अनत सिधारी?
कोमल कूक सुनाव बैठि अजहूँ तरु डारी।
मथुरा, दिल्ली अरु कनौज के विस्तृत खंडहर
करत प्रति-ध्वनि; आज दिवसहू निज कंपित स्वर
जहँ गोरी, महमूद केर पद चिद्द धूरि पर
दिखरावत, भरि नैन नीर, इतिहास-विज्ञ नर
एक पथिक स्वदेश को लौट रहा हैं। उसने थोड़ी ही उम्र में सेना के अफसर, एक मेजर के कहने में आकर अपना देश छोड़ा, घर में किसी से कहा भी नहीं। तब से निरंतर अंग्रेजी सेना के साथ-साथ वह एक देश से दूसरे देश में भ्रमण करता रहा। उसकी नवागत वधू बहुत दिनों तक उसके आसरे में रही, अंत में निराश होकर अपने पिता के घर आकर वह रहने लगी। वहाँ पर उसने अपने वृद्ध पिता की सेवा तथा पथिकों के सत्कार का व्रत लिया। दैवसंयोग से आज स्वयं उसका पति ही पथिक के रूप में उसके सामने आकर उपस्थित हुआ है।
विकल, पीड़ित पीय-पयान ते
चहुँ रह्यौ नलिनी-दल घेरि जो
भुजन भेंटि तिन्हैं अनुराग सो
गमन-उद्यत भानु लखात हैं
तजि तुरंत चले, मुख फेरि के
शिशिर-शीत सशंकित जीव ही
विहग आरत वैन पुकारते
रहि गए, पर ताहि सुनी नहीं
तनि गए सित ओस-वितान हूँ
अनिल झार बहार धरा पर
लुकन लोग लगे घर बीच हैं
विवर भीतर कीट पतंग से
युग भुजा उर बीच समेटि कै
लखहु आवत गैयन फेरि के
कँपत कंबल-बीच अहीर हूँ
भरमि भूलि गई सब तान हैं
किंशुक कानन होते थे लाल
कदंब भी होकर पीले ढले
आम भी भौंरे नचाते थे
भौंरे, बिछाते थे पाँवडे पैरों तले
कोयल कूक के जाती चली
सिर पीट के जाते पपीहे चले
चेत न होता हमें हम कौन हैं
औ किसके रज से हैं पले
जग के सबही काज प्रेम ने सहज बनाये
जीवन सुखमय किया शांति के स्रोत बहाये
द्वेष राग को मेटि सभी में ऐक्य बढ़ाया
धन्य प्रेम तव शक्ति जगत को स्वर्ग बनाया
गगन बीच रवि चंद्र और जितने तारे हैं
सौर जगत अगणित जो प्रभु ने विस्तारे हैं
सबको निज निज ठौर सदा प्रस्थित करवाना
जिस आकर्षण शक्ति प्रेम ने ही हैं जाना
दृग के प्रति रूप सरोज हमारे
उन्हें जग ज्योति जगाती जहाँ
जब बीच कलंब-करंबित कूल से
दूर छटा छहराती जहाँ
घन अंजन-वर्ण खड़े, तृण जाल को
झाईं पड़ी दरसाती जहाँ
बिखरे बक के निखरे सित पंख
विलोक बकी बिक जाती जहाँ
मर्म-स्वर सब भूत को लै, करुण प्रेम जगाय
आदि कवि, कल कंठ तें प्रगटी गिरा जहँ आय
बैठि तुलसी जहाँ 'मानस' द्वार खोलि अनूप
दियो सबहिं दिखाय हरि को लोक-रंजन रूप
नगर से दूर कुछ गाँव की-सी बस्ती एक
हरे-भरे खेतों के समीप अति अभिराम
जहाँ पत्राजाल अंतराल से झलकते हैं
लाल खपरैल, श्वेत छज्जों के सँवारे धाम
बीचो बीच वट-वृक्ष खड़ा हैं विशाल एक
झूलते हैं बाल कभी जिसकी जटाएँ थाम
चढ़ी मंजु मालती-लता हैं जहाँ छाई इुई
पत्थर की पट्टियों की चौकियाँ पड़ी हैं श्याम
तप्त अनुराग जब उर में वसुंधरा का
उठता हैं लहरें सकंप लहकारता
देखता हैं उसे ध्वंस ज्वाला के स्वरूप में तू
प्यार की ललक नहीं उसको विचारता
निज खंड-अनुराग से न मेल खाता देख
नर! तू विभीषिका हैं उसको पुकारता
दूर कर पालन की शक्ति की शिथिलता को
वही नव जीवन से भरी फूँक मारता
प्रखर-प्रणय-पूर्ण दृष्टि से प्रभाकर की
ललक-लपट-भरी भूमि भभराई हैं
पीवर पवन लोट-लोट धूल-धूसरित
झपट रहा हैंबड़ी धूम की बधाई हैं
सूखे तृण-पत्रा लिए कहीं रेणचक्र उठा
घूर्णित प्रमत्ता देता नाचता दिखाई हैं
झाड़ औ झपेट झेल झूमते खड़े हैं पेड़
मर्मर-मिलित हू-हू दे रहा सुनाई हैं
किस अतीत-पट से छन-छनकर
रूप अमित स्मृति-मधु बन-बनकर
खुले नयनपथ की धारा में
कभी टपककर घुल जाते हैं
किसी झलक को ललक-भरे
हम भूल आपको अपनाते हैं
बिछडा-सा कुछ मिल जाता हैं
जीवन जग में खिल जाता हैं
साभार- कविताकोश