रक्षाबंधन भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक 'रक्षा बंधन' असल में मानवीय भावों का बंधन है। यह एक ऐसा उत्सव है जिस पर कवियों और शायरों ने भी अपने एहसास बड़ी संजीदगी से व्यक्त किए। पेश है 'रक्षाबंधन' शायरों के चुनिंदा अल्फाज़-
चली आती है अब तो हर कहीं बाज़ार की राखी
सुनहरी सब्ज़ रेशम ज़र्द और गुलनार की राखी
-नज़ीर अकबराबादी
किसी के ज़ख़्म पर चाहत से पट्टी कौन बाँधेगा
अगर बहनें नहीं होंगी तो राखी कौन बाँधेगा
- मुनव्वर राना
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राखियाँ ले के सिलोनों की बरहमन निकलें
तार बारिश का तो टूटे कोई साअत कोई पल
- अज्ञात
अदा से हाथ उठते हैं गुल-ए-राखी जो हिलते हैं
कलेजे देखने वालों के क्या क्या आह छिलते हैं
-नज़ीर अकबराबादी
फिरें हैं राखियाँ बाँधे जो हर दम हुस्न के तारे
तो उन की राखियों को देख ऐ जाँ चाव के मारे
-नज़ीर अकबराबादी
बहनों की मोहब्बत की है अज़्मत की अलामत
राखी का है त्यौहार मोहब्बत की अलामत
- मुस्तफ़ा अकबर
ज़िंदगी भर की हिफ़ाज़त की क़सम खाते हुए
भाई के हाथ पे इक बहन ने राखी बाँधी
रक्षा-बंधन की सुब्ह रस की पुतली
छाई है घटा गगन पे हल्की हल्की
-फ़िराक़ गोरखपुरी
बिजली की तरह लचक रहे हैं लच्छे
भाई के है बाँधी चमकती राखी
-फ़िराक़ गोरखपुरी
हमारे और उसके बीच इक धागे का रिश्ता है
हमें लेकिन हमेशा वो सगा भाई समझती है