मज़हब पर गुफ़्तुगू एक ऐसी गुफ़्तुगू है जो कभी ख़त्म नहीं होती। आम आदमी उसे अगर ख़त्म करना भी चाहे तो सियासत उसे किसी न किसी रूप में जिंदा रखती है। शायरों ने भी मज़हब अपने नजरिए से देखा है। शेरो-शाइरी की श्रृंखला में पाठकों के लिए पेश है 'मजहब' पर शायरों के अल्फ़ाज-
हर एक दौर का मज़हब नया ख़ुदा लाया
करें तो हम भी मगर किस ख़ुदा की बात करें
- साहिर लुधियानवी
मज़हब की ख़राबी है न अख़्लाक़ की पस्ती
दुनिया के मसाइब का सबब और ही कुछ है
- फ़िराक़ गोरखपुरी
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जहालत रोग था जो दिल के अंदर
वही मज़हब हमारा हो गया है
- अहमद शनास
नाम पे मज़हब के जमघट है लोगों का
शहर में शायद दंगा होने वाला है
- परविंदर शोख़
शैख़ अपनी रग को क्या करें रेशे को क्या करें
मज़हब के झगड़े छोड़ें तो पेशे को क्या करें
- अकबर इलाहाबादी
उसको मज़हब कहो या सियासत कहो
ख़ुदकुशी का हुनर तुम सिखा तो चले
- कैफ़ी आज़मी
मज़हबी बहस मैंने की ही नहीं
फ़ालतू अक़्ल मुझ में थी ही नहीं
- अकबर इलाहाबादी
बहुत बजा है ये मज़हब की मौत पर मातम
मगर कोई तो अज़ादार शायरी का हो
- जमील मज़हरी
इल्म ने रस्म ने मज़हब ने जो की थी बंदिश
टूटी जाती है वो सब बंद खुले जाते हैं
- अकबर इलाहाबादी
हस्ती कोई ऐसी भी है इंसा के सिवा और
मज़हब का ख़ुदा और है मतलब का ख़ुदा और
- नज्म आफ़न्दी
इश्क़ में हर नफ़स इबादत है
मज़हब-ए-इश्क़ आदमियत है
- हफ़ीज़ बनारसी
मेरा मज़हब इश्क़ का मज़हब जिसमें कोई तफ़रीक़ नहीं
मेरे हल्क़े में आते हैं 'तुलसी' भी और 'जामी' भी
- क़ैशर शमीम
मज़हब की ख़राबी है न अख़्लाक़ की पस्ती
दुनिया के मसाइब का सबब और ही कुछ है
-फ़िराक़ गोरखपुरी
सीख नफ़रत की न दे ऐ 'सदा' मज़हब कोई
है उसूल अपना किए जाओ मोहब्बत सब से
जिसमें मज़हब के हर इक रोग का लिक्खा है इलाज
वो किताब हम ने किसी रिंद के घर देखी है
- गोपालदास नीरज
कैसे अपने प्यार के सपने हों साकार
तेरे मेरे बीच है मज़हब की दीवार
- फ़राग़ रोहवी
वतन का ज़र्रा ज़र्रा हम को अपनी जाँ से प्यारा है
न हम मज़हब समझते हैं न हम मिल्लत समझते हैं
- आनंद नारायण मुल्ला
अक़्ल ओ मज़हब की जब आपस में ठनी होती है
फिर तो हर राह-बरी राहज़नी होती है
- जोश मलसियानी
बग़ैर पूछे मेरे सर में भर दिया मज़हब
मैं रोकता भी तो कैसे कि मैं तो बच्चा था
मोहब्बत करने वालों का अलग इक अपना मज़हब है
वो राह-ए-इश्क़ में सूद-ओ-ज़ियाँ देखा नहीं करते