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'जुस्तजू' पर शायरों के अशआर...

रत्नेश मिश्र

Kavya Charcha
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                                                  जुस्तजू का मतलब होता है- आकांक्षा, इच्छा, तलाश। इच्छाएं और कल्पनाएं शायरों के लिए हमेशा से मौजू विषय रहे हैं। पेश है 'जुस्तजू' पर शायरों के अशआर...

हम कि मायूस नहीं हैं उन्हें पा ही लेंगे 
लोग कहते हैं कि ढूँडे से ख़ुदा मिलता है 
- अर्श सिद्दीक़ी

सब कुछ तो है क्या ढूँडती रहती हैं निगाहें 
क्या बात है मैं वक़्त पे घर क्यूँ नहीं जाता 
- निदा फ़ाज़ली

तिरी आरज़ू तिरी जुस्तुजू में भटक रहा था गली गली 
मिरी दास्ताँ तिरी ज़ुल्फ़ है जो बिखर बिखर के सँवर गई 
- बशीर बद्र
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जुस्तुजू जिस की थी उस को तो न पाया हम ने 
इस बहाने से मगर देख ली दुनिया हम ने 
- शहरयार

पा सकेंगे न उम्र भर जिस को 
जुस्तुजू आज भी उसी की है 
- हबीब जालिब

खोया है कुछ ज़रूर जो उस की तलाश में 
हर चीज़ को इधर से उधर कर रहे हैं हम 
- अहमद मुश्ताक़

जुस्तुजू खोए हुओं की उम्र भर करते रहे 
चाँद के हमराह हम हर शब सफ़र करते रहे 
- परवीन शाकिर

तमाम उम्र ख़ुशी की तलाश में गुज़री 
तमाम उम्र तरसते रहे ख़ुशी के लिए 
- अबुल मुजाहिद ज़ाहिद

तिरी तलाश में निकले तो इतनी दूर गए 
कि हम से तय न हुए फ़ासले जुदाई के 
- जुनैद हज़ीं लारी

अब जुस्तजू-ए-दोस्त की मंज़िल कहीं भी हो
हम चल पड़े हैं राह को दुश्वार देख कर
- रविश सिद्दीक़ी

जुस्तजू-ए-शब बुझाती तो मियाँ कुछ ख़ैर थी
रौशनी का कारवाँ चश्म-ए-सहर में खुल गया
- साहिल मुबारकपुरी
6 वर्ष पहले
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