विज्ञापन

आज़ादी की दीवानगी और ये 25 दमदार शेर...

काव्य डेस्क

Kavya Charcha
विज्ञापन
                                    
                     
                                                  आजादी जिंदगी का सबसे खुशनुमा एहसास है। गुलाम भारत को आजाद हुए 71 साल हो गए हैं। आजादी की वर्षगांठ पर हम आपको कुछ ऐसे प्रसिद्ध और दमदार शेर से परिचित करा रहे हैं, जो आपको आजादी की दीवानगी से रूबरू कराएंगे।      
                                                              
                  

                    
                                        
                         
                                                                                   
                            
                         
                                                            
                                
विज्ञापन

भगत सिंह की इन पंक्तियों ने दिया था जोश...

दिल दे तो इस मिजाज का परवरदिगार दे
जो गमों की घड़ी भी खुशी से गुजार दे

लिख रहा हूं मैं अंजाम जिसका कल आगाज आएगा
मेरे लहू का हर एक कतरा इंकलाब लाएगा,
मैं रहूं या न रहूं पर ये वादा है मेरा तुमसे कि
मेरे बाद वतन पर मरने वालों का सैलाब आएगा

उसे यह फिक्र है हरदम नया तर्जे जफा क्या है
हमें यह शौक हैं देखें सितम की इंतहा क्या है

भगत सिंह की इन पंक्तियों ने दिया था जोश...

दहर से क्यों खफा रहें, चर्ख का क्यों गिला करें
सारा जहां अदू सही आओ मुकाबला करें

कोई दम का मेहमां हूं एक अहले महफिल
चरागे शहर हूं, बुझा चाहता हूं

हवा में रहेगी मेरे ख्याल की बिजली
ये मुश्ते खाक है, फानी रहे न रहे

क्या मोल लग रहा है शहीदों के ख़ून का...

न इंतिज़ार करो इनका ऐ अज़ा-दारो
शहीद जाते हैं जन्नत को घर नहीं आते
-साबिर ज़फ़र

क्या मोल लग रहा है शहीदों के ख़ून का
मरते थे जिन पे हम वो सज़ा-याब क्या हुए
-साहिर लुधियानवी

जब देश में थी दीवाली, वो खेल रहे थे होली...

शहीदों की चिताओं पर जुड़ेंगे हर बरस मेले
वतन पर मरनेवालों का यही बाक़ी निशाँ होगा
- जगदंबा प्रसाद मिश्र ‘हितैषी’

जब देश में थी दीवाली, वो खेल रहे थे होली
जब हम बैठे थे घरों में, वो झेल रहे थे गोली
-कवि प्रदीप

मौत एक बार जब आना है तो डरना क्या है!

अजल से वे डरें जीने को जो अच्छा समझते हैं।
मियाँ! हम चार दिन की जिन्दगी को क्या समझते हैं?
- रामप्रसाद बिस्मिल

मौत एक बार जब आना है तो डरना क्या है!
हम इसे खेल ही समझा किये मरना क्या है?
-अशफ़ाकउल्ला खां

मर के पाया शहीद का रुत्बा...

मेरे जज्बातों से इस कदर वाकिफ हैं मेरी कलम
मैं इश्क भी लिखना चाहूँ तो भी, इंकलाब लिख जाता हैं !
- भगत सिंह

मर के पाया शहीद का रुत्बा
मेरी इस ज़िंदगी की उम्र दराज़
-जोश मलीहाबादी

''सैंकड़ों परिंदे आसमान पर आज नजर आने लगे''

हम शहीदों को कभी मुर्दा नहीं कहते 'अनीस'
रिज़्क़ जन्नत में मिले शान यहाँ पर बाक़ी
-अनीस अंसारी

''सैंकड़ों परिंदे आसमान पर आज नजर आने लगे''
''बलिदानियों ने दिखाई है राह उन्हें आजादी से उड़ने की''
-अज्ञात
 

अपनी जुर्रत से...

मुलाजिम हमको मत कहिये, बड़ा अफ़सोस होता है,
अदालत की अदब से हम यहाँ तशरीफ लाये हैं।
पलट देते हैं हम मौजे-हवादिस अपनी जुर्रत से,
कि हमने आंधियों में भी चिराग अक्सर जलाये हैं।
-राम प्रसाद बिस्मिल

मेरी नाकामियों के बाद काम आया तो क्या!

मिट गया जब मिटने वाला फिर सलाम आया तो क्या
दिल की बर्वादी के बाद उनका पयाम आया तो क्या

मिट गईं जब सब उम्मीदें मिट गए जब सब ख़याल,
उस घड़ी ग़र नामावर लेकर पयाम आया तो क्या !

ऐ दिले-नादान मिट जा तू भी कू-ए-यार में,
फिर मेरी नाकामियों के बाद काम आया तो क्या !

काश! अपनी जिंदगी में हम वो मंजर देखते,
यूँ सरे-तुर्बत कोई महशर-खिराम आया तो क्या !

आख़िरी शब दीद के काबिल थी 'बिस्मिल' की तड़प,
सुब्ह-दम कोई अगर बाला-ए-बाम आया तो क्या !

-राम प्रसाद बिस्मिल

राम प्रसाद बिस्मिल...

“तबाही जिसकी किस्मत में लिखी वर्के-हसद से थी,
उसी गुलशन की शाखे-खुश्क पर है आशियाँ मेरा।”

दुनिया से गुलामी का मैं नाम मिटा दूंगा,
एक बार ज़माने को आज़ाद बना दूंगा।

बेचारे ग़रीबों से नफ़रत है जिन्हें, एक दिन,
मैं उनकी अमरी को मिट्टी में मिला दूंगा।

यह फ़ज़ले-इलाही से आया है ज़माना वह,
दुनिया की दग़ाबाज़ी दुनिया से उठा दूंगा।

ऐ प्यारे ग़रीबों! घबराओ नहीं दिल में
हक़ तुमको तुम्हारे, मैं दो दिन में दिला दूंगा।

बंदे हैं ख़ुदा के सब, हम सब ही बराबर हैं,
ज़र और मुफ़लिसी का झगड़ा ही मिटा दूंगा।

जो लोग ग़रीबों पर करते हैं सितम नाहक़,
ग़र दम है मेरा क़ायम, गिन-गिन के सज़ा दूंगा।
 

वो चुप रहने को कहते हैं, जो हम फ़रियाद करते हैं...

यह कह-कहकर बसर की, उम्र हमने कै़दे-उल्फ़त में,
वो अब आज़ाद करते हैं, वो अब आज़ाद करते हैं।

सितम ऐसा नहीं देखा, जफ़ा ऐसी नहीं देखी,
वो चुप रहने को कहते हैं, जो हम फ़रियाद करते हैं।

यह बात अच्छी नहीं होती, यह बात अच्छी नहीं करते,
हमें बेकस समझकर आप क्यों बरबाद करते हैं?

कोई बिस्मिल बनाता है, जो मक़तल में हमें ‘बिस्मिल’,
तो हम डरकर दबी आवाज़ से फ़रियाद करते हैं।   

-राम प्रसाद बिस्मिल
8 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Ankit Kumar

10482 कविताएं

View Profile