गीत चतुर्वेदी आज के दौर के प्रसिद्ध कवियों में से एक हैं और युवाओं में ख़ास तौर पर लोकप्रिय हैं। पढ़ें उनके काव्य संग्रह आलाप में गिरह से चुनिंदा पंक्तियां
मैं बोलते समय अपने हाथ भी हिलाता हूँ
खट-खट जमीन पर ठोंकता हूँ अपने जूते
चुटकी बजाता हूँ, ताली पीटता हूँ, एक सीटी भी मार देता हूँ
तीन शब्द में होना था काम
तीन लाख शब्द ज़ाया हो गए
क्या मुझे ज़ोर से चिल्लाना चाहिए?
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बड़े-से घंटे पर कोई मारता है हथौड़ा
अंतरिक्ष में टूटता है कोई पुच्छल तारा
गलियारे से चलने की आवाज़ आती है
कौन है जो गुज़रा है अभी-अभी
हड्डियाँ पहन
उड़ न जाए
सो पत्थरों से ढाँपकर रखा यह तन
ग़फ़लत में हो गए किसी पुण्य का
असर हो जाए कभी
इंतज़ार में हूँ
हम उस ग़ज़ल के शे’र हैं
जिसका क़ाफ़िया टूट कर
कहीं छूट गया है
जिन्होंने हमेशा बह्र का ख़याल रखा
तुक के लिए सटीक शब्द
खोजने पर नए छंद भी मिले
मात्राएँ गिनने में कोई ग़लती न हुई
ग्यारह-तेरह तेरह-ग्यारह के नियम बनाए
सुंदरता उनकी बाँहों में हाथ डाल चली गई
काग़ज़ का भी अलग विज्ञान है
पड़े-पड़े पीला पड़ जाता है
साल-भर पुराना
सदियों पुराना लगता है
कुछ चीज़ें पड़े-पड़े काली हो जाती हैं
कुछ मटमैली
कुछ सवाल हैं, रूढ़ियाँ, गूढ़ताएँ
इनके रंग पर कोई असर नहीं पड़ता
आत्महत्या का बेहतरीन तरीक़ा होता है
इच्छा की फ़िक्र किए बिना जीते चले जाना
पाँच हज़ार वर्ष से ज़्यादा हो चुकी है मेरी आयु
अदालत में अब तक लम्बित है मेरा मुक़दमा
सुनवाई के इंतज़ार से बड़ी सज़ा और क्या
बेतहाशा दुखती है कलाई के ऊपर एक नस
हृदय में उस कृत्य के लिए क्षमा उमड़ती है
जिसे मेरे अलावा बाक़ी सब ने अपराध मना
संविधान की क़िताब में इस पर कोई अनुच्छेद नहीं।
साभार- कविताकोश