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भौंडे गीतों के इस अंधेरे दौर में इरशाद एक रौशनी की किरण हैं

काव्य डेस्क

Kavya Charcha
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                                                  लव आजकल, रॉकस्टार, आशिकी-2, चमेली जैसी फिल्मों के गाने लिखने वाले गीतकार इरशाद कामिल नाजुक दिल के शायर हैं और बड़े शालीन व्यक्तित्व के धनी हैं। लेकिन अपने गीतों में वाे एहसासों की गहराई में उतरकर शब्दों के मोती खोज लाते हैं और बहुत सरल भाषा में जवां सोच को अपनी रचनाओं में ढाल लेते हैं। मतलब यह कि इस शायर, कवि के अंदर मौजूद इंसान बहुत संवेदनशील है। वह अगर अपने कविताओं और गीतों से सुकून पहुंचाता है तो अपना गुस्सा भी जाहिर करता है। जातिभेद, रंगभेद जैसे मसलों पर इरशाद अपनी कविताओं के जरिये प्रहार करते हैं - 

मैं फिर आऊंगा 
वाे बनकर
जाे तुम्हें अच्छा लगे 
तुम्हारे पास रहे 

मैं तुम्हारी टीस, तुम्हारा दर्द 
तुम्हारा खालीपन समेटकर 
जा रहा हूँ जमीं के पार
हर इक ज़हन से परे 
हर इक चुभन से परे 
इसी अासरे 
कि इस बार 
व न मेरी जात अलग हाेगी 
न मेरा रंग अलग हाेगा।

शुरुआती दिनों में इरशाद टीवी शो के टाइटल ट्रैक लिखते थे। पंकज कपूर द्वारा निर्देशित शो दृष्टम का टाइटल ट्रैक लिखने के बाद उन्हें फिल्मों में एंट्री मिल गयी थी। उन्होंने बतौर गीतकार फिल्म चमेली के लिए पहली बार गीत लिखे - 

बहता है मन कहीं 
कहां जानती नहीं 
कोई रोक ले यहीं 
भागे रे मन कहीं आगे रे मन 
चला जाने किधर जानू ना 

 

फिल्म चमेली के सभी गाने हिट रहे। फिर क्या था, इंडस्ट्री में हर निर्माता-निर्देशक इरशाद को खोजने लगा। फिल्म 'जब वी मेट के' गानों से इरशाद को पहली बार प्रसिद्धि मिली थी।

ना है ये पाना ना खोना ही है
तेरा ना होना जाने क्यूँ होना ही है
तुमसे ही दिन होता है सुरमई
शाम आती तुमसे ही, तुमसे ही 

 

'रॉकस्टार' का गीत 'साड्डा हक एत्थे रख' तो युवाओं की जुबान पर चढ़ गया।

तुम लोगों इस दुनिया 
हर कदम इंसान 
मैं सही समझ के जो भी करूं
तुम कहते हो ग़लत

मैं ग़लत हूँ तो फिर कौन 
तो फिर कौन फिर कौन 
मर्ज़ी से जीने की भी 
क्या तुम सबको मैं अर्ज़ी 
मतलब की तुम सबका 
मुझसे भी ज़्यादा हक़ 
साड्डा हक एत्थे रख 

 

इसके अलावा 'नगाड़ा-नगाड़ा', 'हीर तो बड़ी सैड है' और 'अंगरेजी बीट' जैसे गाने भी बहुत हिट हुए। मोहित चौहान की आवाज, गाने की धुन, उसकी कशिश इरशाद को अलग पंक्ति में खड़ा करती है। 
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लीक से हटकर चलने में विश्वास रखते हैं इरशाद

इरशाद कामिल

इरशाद हमेशा लीक से हटकर चलने में विश्वास रखते हैं। 1971 में पंजाब के एक छोटे से कस्बे मलेरकोटला में जन्मे इरशाद ने पंजाब विश्वविद्यालय से समकालीन हिन्दी कविता पर पीएच.डी की। 'द ट्रिब्यून', 'जनसत्ता' जैसे अखबारों में नौकरी करने के बाद 2001 में सब छोड़छाड़ कर मुंबई चले गए और आज वो बॉलीवुड के अगली पंक्ति के गीतकार बन गए। हिंदी में पढ़ाई के बावजूद अंग्रेजी और उर्दू पर भी उनका समान अधिकार है।

मशहूर फिल्म समीक्षक जयप्रकाश चौकसे इरशाद के बारे में लिखते हैं, "भाषाओं की जानकारी और शैक्षणिक योग्यता से अधिक जरूरी है सीने में एक जलन, मौजूदा सांस्कृतिक शून्यता और प्रतिक्रियावादी ताकतों के खिलाफ विद्रोह की तीव्र कामना। लम्बी और सार्थक पारी खेलने वाला व्यक्ति हमेशा ऐसे ही तेवर लेकर आता है। इरशाद ऐसे ही शायर हैं।

इरशाद के ये तेवर फिल्म 'रॉकस्टार' के समय उफान पर थे। वो लिखते हैं - 'मर्जी से जीने का भी मैं क्या अर्जी दूँ' मतलब कि तुम सबका मुझपे ज्यादा हक़ है। इरशाद फिल्म निर्देशक इम्तियाज अली के प्रिय गीतकार हैं। इरशाद को अब तक दो फिल्म फेयर अवार्ड्स के अलावा, स्क्रीन आइफा, अप्सरा, जीमा, मिर्ची म्यूजिक, बिग एंटरटेनमेंट, ग्लोबल इंडियन फिल्म जैसे कई फ़िल्म अवार्ड्स मिल चुके हैं।

इरशाद ने नज़्में भी लिखी हैं। उनकी किताब 'एक महीना नज़्मों का' उनकी डायरी में लिखी मोहब्बत भरी नज़्मों का संकलन है। इरशाद की एक कविता देखिए - 

सूखे होंठ जब प्यास की जुबान में बात करते हैं 
तो उम्मीद की शाख पर आती है पहली पत्ती 
             होता है
पहली बार मोहब्बत सुनाने जैसा एहसास 
           सूखे हुए होंठ 
मुस्कराहट में बादल की तरह फैट जाते हैं 
तहस-नहस हो जाता है लफ़्ज़ों का शहर 
नहीं सुनाई देती जिस्म की पुकार 
अपना सा कोई फ़ैल जाता है आसमान से ज़मीन तक 
छूने की ख़्वाहिश ओस बन जाती है 
मिलने की ख्वाहिश धूप 
एहसास के दरिया में बहता रहता है इंसान 
 सूखे होठों के साथ भी 
 ज़िन्दगी को तर करता हुआ ।

इरशाद के नज्मों में प्रेम की आग लहकती रहती है। वो अपनी हर नज्म में अपने को एक प्रेमी के बतौर ही पेश करते हैं। इरशाद बोलचाल की भाषा और रोजमर्रा की घटनाओं को ही अपने गीतों में ढाल देते हैं। भाषा को लेकर यही सतर्कता ही किसी लेखक को अधिक से अधिक पाठकों से जोड़ती है। ये किताबें ले आओ, जिसपे चलता हुआ एक गीत, जैसी रचनाओं से इस बात को समझा जा सकता है। भौंडे गीतों के इस अंधेरे दौर में इरशाद एक रौशनी की किरण हैं। आम आदमी उनकी कविताओं में ख़ुद को तलाश सकता है। इरशाद की एक कविता देखिए, यह कविता हर युवा की कहानी है - 

किराये का घर बदलते हुए
सफाई हो जाती है उन चीज़ों की भी
पता नहीं होता जिनके बारे
कि अभी हैं
मध्यवर्ग की मजबूरियां...

पुराने दोस्तों के छूटने का मलाल
नए दोस्तों से मिलने की झिझक
घर - दर - घर
मोहल्ला - दर - मोहल्ला
हमारी सोहबत में
हमारे जैसा हो जाता है
वो घर
घर नहीं होता
पिता की मजबूरियों का मुख्यालय होता है 

आत्मविश्वास का आना
बैन होता है जिसमें
मलकीयत वाले पड़ोसियों से
बनाकर रखनी पड़ती है

बचपन के टुकड़े
कई मोहल्ले बांट लेते हैं आपस में

बिना किराया दिये रहता है जिसमें
मकान मालिक का डर
किरायेदार का विशेषण
और
नया महीना चढऩे का दु:ख

किराये का घर
देह होती है, मोह होता है
एक दिन छोड़ना पड़ता है। 
8 वर्ष पहले
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