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जब पाकिस्तान में साड़ी पहनने पर पाबंदी लगी तब फ़ैज़ साहब की ये नज़्म खूब गायी गई...

रत्नेश मिश्र

Kavya Charcha
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                                                  साल 1985, जब पाकिस्तान में जनरल ज़िया उल हक़ की तानाशाही चरम पर थी, उन्होंने एक फ़रमान के तहत औरतों के साड़ी पहनने पर पाबंदी लगा दी थी, फैज़ साहब से जनरल ज़िया नाराज़गी जगजाहिर थी। उनकी नज़्में- ग़ज़लें पाकिस्तान के रेडियो, टीवी पर प्रसारित नहीं होती थीं, ऐसे में पाकिस्तान की मशहूर गायिका इक़बाल बानो ने विरोध दर्ज कराते हुए लाहौर के लाहौर के अलहमरा ऑडिटोरियम में काले रंग की साड़ी पहन कर फ़ैज़ साहब की ये नज़्म गाई। 

हम देखेंगे 
लाज़िम है कि हम भी देखेंगे 
वो दिन कि जिस का वादा है 
जो लौह-ए-अज़ल में लिख्खा है 
जब ज़ुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गिराँ 
रूई की तरह उड़ जाएँगे 

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हम महकूमों के पाँव-तले 
जब धरती धड़-धड़ धड़केगी 
और अहल-ए-हकम के सर-ऊपर 
जब बिजली कड़-कड़ कड़केगी 
जब अर्ज़-ए-ख़ुदा के काबे से 
सब बुत उठवाए जाएँगे 

हम अहल-ए-सफ़ा मरदूद-ए-हरम 
मसनद पे बिठाए जाएँगे 
सब ताज उछाले जाएँगे 
सब तख़्त गिराए जाएँगे 
बस नाम रहेगा अल्लाह का 
जो ग़ाएब भी है हाज़िर भी 
जो मंज़र भी है नाज़िर भी 

उट्ठेगा अनल-हक़ का नारा 
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो 
और राज करेगी ख़ल्क़-ए-ख़ुदा 
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो 
6 वर्ष पहले
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