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पाश की कविता, जो ज़िंदगी का मतलब आपके देखे हुए सपनों में देखती है...

काव्य डेस्क

Kavya Charcha
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                            आदमी ज़िंदगी में जो होता है और जो होना चाहता है उसी के बीच की अवस्‍था को कविता या शायरी बयां करती है। इस बीच के अंतर को पाश की कविताएं बख़ूबी बयां करती हैं। 
        
                                                    
                            

पाश की सबसे लोकप्रिय रचनाओं में से एक सपनों का मर जाना है... सबसे ख़तरनाक होता है आदमी के सपनों का मर जाना। पाश के ये बोल उनको एक क्रांतिकारी कवि के रूप में स्‍थापित करते हैं। पाश गांधी और नेहरू के विचारों के पोषक नहीं हैं। अपनी उम्मीदों को हमेशा जवां रखने का जज़्बा रखे हुए वह शहीदे आज़म भगत सिंह के क़रीब ठहरते हैं। 

बक़ौल पाश, सपनों का मरना सबसे बड़ी लूट है। वह सोचते हैं कि तड़प होगी तो आदमी अपने आप बढ़ेगा। उम्मीद होगी तो उसकी वैचारिक फ़सल अपने आप लहलहाएगी। पाश एक तरह से अपने लिए ही नहीं ब‌ल्कि सबके लिए एक समतावादी सोच चाहते ‌थे। लिहाज़ा वह सपनों और उम्मीद को जीवन का एक अहम पायदान मानते हैं। पाश का यह आशावाद उन्‍हें दुनिया को तहे दिल से प्यार करने वाले कवि की संज्ञा देता है।

उनकी सबसे चर्चित यह कविता उन लोगों का मुंह बंद करने के लिए एक पुख़्ता सबूत है जो कहा करते हैं कि पाश बाद के दौर में मायूस हो चले ‌थे। ऐसा नहीं है। पाश का क्रांतिकारी मानवतावाद अंतिम सांस तक सलामत था। अंतिम सांस तक वह जीवन, संघर्ष, सृजन और सौंदर्य के रचयिता बने रहे। इसी के जरिए वह सच्चाई का मेनिफेस्टो पेश करते रहे। बग़ावत का ऐलान करते रहे।

परजीवी शोषक-शासक वर्गों को चुनौती देते रहे। चुनौती से भागने वालों को दुत्कारते रहे। वह यथास्थितिवाद के मुंह पर थूकते रहे। सपने पर जोर देने वाले पाश आज पंजाब और पंजाबी के ही नहीं बल्कि पूरे भारत के कवि हैं और सभी भारतीय भाषाओं में पढ़े जाते हैं।

भगत सिंह के बारे में एक टिप्पणी के अंत में पाश ने लिखा था कि जिस दिन उसे फांसी लगी, उसकी कोठरी से लेनिन की किताब मिली थी, जिसका एक पन्ना मोड़ा हुआ था। पंजाब की जवानी को उसके आख़िरी दिन के मोड़े हुए पन्ने से आगे बढ़ाना है। ख़ालिस्तानियों की गोली से शहीद होने से पहले पाश भी जिंदगी और शायरी की जद्दोजहद की किताब का एक पन्ना मोड़ा हुआ छोड़ गए थे। पंजाब के और पूरे भारत के प्रतिबद्ध कवियों को उसी मोड़े हुए पन्ने से आगे बढ़ना है। 

उनकी कविताओं में जूझते रहने की जिजीविषा उन्हें समय को चुनौती देने वाली क़लम का एक कद्दावर किरदार बनाती है। कविताओं में आगे बढ़ने का उनका उल्लेख बताता है कि वह सपनों और उम्मीदों के किनारे ही शायद पले और बढ़े हैं। पाश की कविताओं में बैल, रोटियां हुक्‍का, चांद की रात अर्थात पूरे गांव की एक सोंधी ‌ख़ुश्बू है। यह आम आदमी की उम्‍मीद ही तो है, जिसे हमेशा पाश जवां बने रहने की ताकीद करते हैं। पाश ने कहा है कि मैं आदमी हूं, बहुत-बहुत छोटा-छोटा, कुछ जोड़कर बना हूं। यह उनकी आस को ही जगज़ाहिर करता है। वे ज़िंदगीभर इसी छोटे-छोटे बहुत कुछ को बचाने की को‌शिश करते रहे। पाश दुनिया को जीने लायक़ बनाने में सपने को महत्वपूर्ण मानते हैं। वह जीवन को या यूं कहें कि जीते रहने की अभिलाषा को बेहद प्यार करते हैं तभी तो वह कविता में लिखते हैं कि मेरे हिस्से की ज़‌िंदगी भी जी लेना मेरे दोस्त।

पाश ने यह सब लिखने से पहले अपने में इन सबको जिया है। पाश के शब्दों में शायद यह ताक़त इसलिए थी कि इन्हें सबसे पहले उन्होंने खुद ही झेला। उम्मीद को सिरआंखों पर रखने वाले पाश अपने निजी जीवन में बेख़ौफ़ और बेबाक थे। इश्क़ और नशा इस पर भी उन्होंने काफ़ी कुछ लिखा। वह शुद्ध थे। मिलावटी या नक़ल करना उनके स्वभाव में नहीं ‌था। घुटकर-डरकर जीना पाश को बिलकुल पसंद नहीं था। उन्हें अंतिम समय में अपने लिए सुरक्षित दिनों का इंतज़ार नहीं था। वह सपनों को मुकम्मल करके उसे जीने में यकीन करते थे। पाश जीवन में बीच का रास्ता अख़्तियार नहीं करते हैं। वह सपनों और उम्मीद के बीच जीवन को संघर्ष की वेदी पर एक शाश्वत ज्वाला मानते हैं। यह रोशनी हमेशा चमकती रहेगी, पाश के मंसूबो के साथ। 

सबसे ख़तरनाक है सपनों का मर जाना 

मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
गद्दारी, लोभ की मुट्ठी
सबसे ख़तरनाक नहीं होती

बैठे बिठाए पकड़े जाना बुरा तो है
सहमी सी चुप्पी में जकड़े जाना बुरा तो है
पर सबसे ख़तरनाक नहीं होती

सबसे ख़तरनाक होता है
मुर्दा शांति से भर जाना
ना होना तड़प का
सब कुछ सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर
और काम से लौट कर घर आना
सबसे ख़तरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना 

सबसे खतरनाक वो आंखें होती है
जो सब कुछ देखती हुई भी जमी बर्फ होती है..
जिसकी नज़र दुनिया को मोहब्बत से चूमना भूल जाती है
जो चीज़ों से उठती अन्धेपन कि भाप पर ढुलक जाती है
जो रोज़मर्रा के क्रम को पीती हुई 
एक लक्ष्यहीन दुहराव के उलटफेर में खो जाती है
सबसे ख़तरनाक वो दिशा होती है 
जिसमे आत्मा का सूरज डूब जाए
और उसकी मुर्दा धूप का कोई टुकड़ा 
आपके ज़िस्म के पूरब में चुभ जाए

(साभार: लहू है कि तब भी गाता है, संपादन-चमनलाल, कात्यायनी, प्रकाशन-परिकल्पना, जनचेतना, डी-68, निरालानगर, लखनऊ)
9 वर्ष पहले
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