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दिनेश कुमार शुक्ल की बहुचर्चित कविता : जाग मेरे मन, मछंदर

काव्य डेस्क

Kavya Charcha
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                                                  दिनेश कुमार शुक्ल ( जन्म-8 अप्रैल, 1950)  यानि हिंदी के समकालीन कवियों में जाना-माना नाम।  दिनेश कुमार शुक्ल की अद्भुत शैली ने समकालीन कविता के साहित्यिक मानकों से समझौता किए बगैर कविता को आम लोगों के क़रीब लाने का सार्थक काम किया है। 'कथा कहो कविता' और 'आखर अरथ' 'ललमुनिया की दुनिया'  उनकी कविता संग्रहों के नाम हैं। उनकी कविताएं  उस पूरे अवसाद से परिचित हैं, जिसे समय ने अपनी उपलब्धि के रूप में अर्जित किया है, लेकिन वह उम्मीद की अपनी ज़मीन नहीं छोड़ती।  आज दिनेश कुमार शुक्ल का जन्मदिन है, इस अवसर पर पेश कर हे हैं उनकी मशहूर कविता-  


जाग मेरे मन, मछंदर !

रमी है धूनी
सुलगती आग
मेरे मन, मछंदर!

जाग मेरे मन, मछंदर!

किंतु मन की
तलहटी में
बहुत गहरी
और अंधेरी
खाइयां हैं
रह चुकीं जो
डायनासर का बसेरा
सो भयानक
कंदराएं हैं,
कंदराओं में भरे
कंकाल
मेरे मन, मछंदर!
रेंगते भ्रम के
भयानक व्याल
मेरे मन, मछंदर!

क्षुद्रता के
और भ्रम के
इस भयानक
नाग का फन
ताग तू
फिर से मछंदर!

जाग मेरे मन, मछंदर!

रमी है धूनी
सुलगती आग
मेरे मन, मछंदर!

सूखते हैं खेत
भरती रेत
जीवन हुआ निर्जल
किंतु फिर भी
बह रहा कल-कल,
क्षीण-सी जलधार ले कर
प्यार और दुलार ले कर
एक झरना फूटता
मन में, मछंदर!
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भरा है सागर मेरे मन

भरा है सागर मेरे मन
जहां से उठ कर
मघा के
मेघ छाते हैं
और मन के गगन में घिर
गरजते हैं घन, मछंदर!
वृष्टि का उल्लास
भर कर जाग
मेरे मन, मछंदर!

सो रहा संसार

सो रहा संसार
पूंजी का
विकट भ्रमजाल—
किंतु फिर भी सर्जना के
एक छोटे-से नगर में
जागता है एक नुक्कड़
चिटकती चिंगारियां
उठता धुआं है
सुलगता है एक लक्कड़,
तिलमिलाते आज भी
कुछ लोग
सुन कर देख कर अन्याय
और लड़ने के लिए
अब भी बनाते मन, मछंदर!

फिर नए संघर्ष का
उन्वान ले कर

जाग मेरे मन, मछंदर!

बिक रहे मन, बिक रहे तन

बिक रहे मन
बिक रहे तन
देश बिकते
दृष्टि बिकती
एक डॉलर पर
समूची सृष्टि बिकती
और
राजा ने लगाया
फिर हमें नीलाम पर
एक कौड़ी दाम पर
लो बिक रहा
जन-गण, मछंदर!

मुक्ति का परचम उठाकर
जाग मेरे मन, मछंदर!

गीत बिकते गान बिकते

गीत बिकते गान बिकते
मान और अभिमान बिकते
हर्ष और विषाद बिकते
नाद और निनाद बिकते
बिक रही हैं कल्पनाएं
बिक रही हैं भावनाएं
और, अपने बिक रहे हैं
और, सपने बिक रहे हैं
बिक रहे बाजार की
खिल्ली उड़ाता
विश्व के बाजार के
तंबू उड़ाता
आ गया गोरख
लिए नौ गीत अपने
सुन, मछंदर !

सो रहे संसार में...

सो रहे संसार में
नव जागरण का
ज्वार ले कर कांप
कांप रचना के
प्रबल उन्माद में
थर-थर मछंदर!

फिर चरम बलिदान का
उद्दाम निर्झर बन मछंदर!

जाग जन-जन में, मछंदर!
जाग कण-कण में, मछंदर!

रमी है धूनी
सुलगती आग
मेरे मन, मछंदर !
 
5 वर्ष पहले
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