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अमन-भाईचारे के गुलशन से महकते ये 20 शेर

शरद मिश्र

Kavya Charcha
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                                                  दिल्ली में पत्थरबाजी और हिंसा से सात लोगों की मौत हो चुकी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सपरिवार भारत दौरे के दौरान इस तरह की हिंसा देश दुनिया में भारत की एक गलत छवि पेश करेगी। ऐसे माहौल में अमन चैन और भाईचारे के गुलशन से महकते ये 20 शेर आप पढ़ें और आपसी सद्भाव को कायम रखने की मिसाल पेश करें।    
                                                              
                  

                    
                                        
                         
                                                                                   
                            
                         
                                                            
                                
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न पूरे शहर पर छाए तो कहना... 

धुआँ जो कुछ घरों से उठ रहा है 
न पूरे शहर पर छाए तो कहना 
जावेद अख़्तर

दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे 
जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों 
बशीर बद्र

टाँग दीजे ऊँची मीनारों के बीच...

एक तख़्ती अमन के पैग़ाम की
टाँग दीजे ऊँची मीनारों के बीच
- अज़ीज़ नबील

हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी 
जिस को भी देखना हो कई बार देखना 
निदा फ़ाज़ली

देखोगे तो हर मोड़ पे मिल जाएँगी लाशें... 

एक आँसू भी हुकूमत के लिए ख़तरा है 
तुम ने देखा नहीं आँखों का समुंदर होना 
मुनव्वर राना


देखोगे तो हर मोड़ पे मिल जाएँगी लाशें 
ढूँढोगे तो इस शहर में क़ातिल न मिलेगा 

मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद
 

काँटों से गुज़र जाता हूँ दामन को बचा कर 
फूलों की सियासत से मैं बेगाना नहीं हूँ 

शकील बदायुनी

समझने ही नहीं देती सियासत हम को सच्चाई 
कभी चेहरा नहीं मिलता कभी दर्पन नहीं मिलता 

अज्ञात

कहीं हो जलता मकाँ अपना घर लगे है मुझे...

ये दुनिया नफ़रतों के आख़री स्टेज पे है
इलाज इस का मोहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं है
- चरण सिंह बशर

अजीब दर्द का रिश्ता है सारी दुनिया में
कहीं हो जलता मकाँ अपना घर लगे है मुझे
- मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद

न उर्दू न हिन्दी न हिन्दोस्तानी...

मुझ में थोड़ी सी जगह भी नहीं नफ़रत के लिए
मैं तो हर वक़्त मोहब्बत से भरा रहता हूँ
- मिर्ज़ा अतहर ज़िया


'हफ़ीज़' अपनी बोली मोहब्बत की बोली
न उर्दू न हिन्दी न हिन्दोस्तानी
- हफ़ीज़ जालंधरी
 

मेरा पैग़ाम मोहब्बत है जहाँ तक पहुँचे... 

अगर तुम्हारी अना ही का है सवाल तो फिर 
चलो मैं हाथ बढ़ाता हूँ दोस्ती के लिए 

अहमद फ़राज़


उन का जो फ़र्ज़ है वो अहल-ए-सियासत जानें 
मेरा पैग़ाम मोहब्बत है जहाँ तक पहुँचे 

जिगर मुरादाबादी

आदमी आदमी को भूल गया... 

सात संदूक़ों में भर कर दफ़्न कर दो नफ़रतें 
आज इंसाँ को मोहब्बत की ज़रूरत है बहुत 

बशीर बद्र


सब से पुर-अम्न वाक़िआ ये है 
आदमी आदमी को भूल गया 

जौन एलिया

सुनो ये फ़र्ज़ तुम्हारा भी है हमारा भी... 

इक शजर ऐसा मोहब्बत का लगाया जाए 
जिस का हम-साए के आँगन में भी साया जाए 

ज़फर ज़ैदी


फ़ज़ा ये अम्न-ओ-अमाँ की सदा रखें क़ाएम 
सुनो ये फ़र्ज़ तुम्हारा भी है हमारा भी 

नुसरत मेहदी

न जाने आज यहाँ कौन मारा जाएगा... 

बादलों ने आज बरसाया लहू 
अम्न का हर फ़ाख़्ता रोने लगा 

ज़फ़र हमीदी


ब-नाम-ए-अम्न-ओ-अमाँ कौन मारा जाएगा 
न जाने आज यहाँ कौन मारा जाएगा 

नसीम सहर
 
6 वर्ष पहले
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