ख़ुशी, ग़म, दर्द जैसे शब्द हमारी ज़िंदगी में इस तरह रचे-बसे हुए हैं कि गाहे-बगाहे इनसे भेंट होती रहती है। शायर जब अपने दर्द को इकट्ठा करता है और उसे अपने अल्फ़ाज़ों से सजाता है, फिर जो शेर बनते हैं वो दर्द का इलाज भले ही ना कर पाएं लेकिन कुछ देर के लिए मरहम का काम ज़रूर करते हैं। पेश है 'दर्द' पर चुनिंदा शायरों के अल्फ़ाज़-
अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपाएँ कैसे
तेरी मर्ज़ी के मुताबिक़ नज़र आएँ कैसे
- वसीम बरेलवी
ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया
जाने क्यूँ आज तेरे नाम पे रोना आया
- शकील बदायुनी
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नींद तो दर्द के बिस्तर पे भी आ सकती है
उनकी आग़ोश में सर हो ये ज़रूरी तो नहीं
- ख़ामोश ग़ाज़ीपुरी
बेनाम सा ये दर्द ठहर क्यूँ नहीं जाता
जो बीत गया है वो गुज़र क्यूँ नहीं जाता
- निदा फ़ाज़ली
अब के सफ़र में दर्द के पहलू अजीब हैं
जो लोग हम-ख़याल न थे हम-सफ़र हुए
- खलील तनवीर
दर्द सा दर्द है भरा उसमें
टूटे दिल की सदा को रोते हैं
-रियाज़ ख़ैराबादी
पहलू का दर्द कैसा है ये तो बताइए
देखूँ मैं नब्ज़ हाथ तो अपना बढ़ाइए
-मिर्ज़ा सलामत अली दबीर
अब तो ख़ुशी का ग़म है न ग़म की ख़ुशी मुझे
बेहिस बना चुकी है बहुत ज़िंदगी मुझे
- शकील बदायुनी
अब ये भी नहीं ठीक कि हर दर्द मिटा दें
कुछ दर्द कलेजे से लगाने के लिए हैं
- जाँ निसार अख़्तर
दर्द जितना भी उसे बेदर्द दुनिया से मिला
शायरी में ढल गया कुछ आँसुओं में बह गया
- हबीब जालिब
ख़ूब इलाज कर दिया अपने मरीज़-ए-इश्क़ का
दर्द मिटाने आए थे दर्द दिया मिटा दिया
- बासित भोपाली
तसव्वुर ज़ुल्फ़ का गर छोड़ दूँ मिज़्गाँ का खटका है
जो सर के दर्द से फ़ुर्सत मिली दर्द-ए-जिगर होगा
- आग़ा अकबराबादी
अपना दर्द भुला दें ऐ दिल उस के दर्द की ख़ातिर
अपने घाव याद न आएँ चाँद का घाव देखें
- अहमद ज़फ़र
जब मरीज़-ए-इश्क़ को कोई दवा आई न रास
दर्द ही को दर्द की आख़िर दवा हम ने कहा
-अज्ञात
दर्द ऐसा है कि जी चाहे है ज़िंदा रहिए
ज़िंदगी ऐसी कि मर जाने को जी चाहे है
- कलीम आजिज़
अब थकन दर्द बनती जाती है
दिल से कुछ काम भी तो ऐसे लिए
- फ़ातिमा हसन
अगर मौजें डुबो देतीं तो कुछ तस्कीन हो जाती
किनारों ने डुबोया है मुझे इस बात का ग़म है
- दिवाकर राही
बेदर्द मुझ से शरह-ए-ग़म-ए-ज़िंदगी न पूछ
काफ़ी है इस क़दर कि जिए जा रहा हूँ मैं
- हादी
दर्द ओ ग़म दिल की तबीअत बन गए
अब यहाँ आराम ही आराम है
- जिगर मुरादाबादी
दिल दबा जाता है कितना आज ग़म के भार से
कैसी तन्हाई टपकती है दर ओ दीवार से
- अकबर हैदराबादी