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बाबा फरीद: इह दो नैना मत छुओ, मोहे पिय देखन की आस...

काव्य डेस्क

Kavya Charcha
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                                                  पंजाब के सूफी कवि बाबा फरीद का जन्म 1173 को हुआ था। निधन 6 अक्टूबर 1266 को हुआ। सिख गुरुओं ने इनकी रचनाओं को सम्मान सहित श्री गुरु ग्रंथ साहिब में स्थान दिया। इनके काव्य में सूफी टच नजर आता है। वर्तमान समय में भारत के पंजाब प्रांत में स्थित फरीदकोट शहर का नाम बाबा फरीद पर ही रखा गया। बाबा फरीद की मज़ार पाकपट्टन शरीफ पाकिस्तान में है। 
 
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तन सुका, पिंजर थिया... ... .... काग...

बाबा फरीद कवि, दार्शनिक और संत कोटि के महात्मा थे। प्रेम भाव की रचनाएं इनके व्यक्तित्व को दर्शाती है। इनके प्रेम भाव को दर्शाता यह प्रसंग काफी अहम है।

तन सुका, पिंजर थिया... ... .... काग,
इह दो नैना मत छुओ, मोहे पिय देखन की आस।


वृद्ध अवस्था में एक समय ऐसा भी था कि इनके शरीर को कौओं ने नोच कर खाना शुरु कर दिया। दयावश होकर इन्हें भी बाबा फरीद ने मना नहीं किया, मात्र इतनी विनती की कि वे बस उनकी आँखों को मत छुएं क्योंकि इनसे वे अपने प्रिय प्रभु के दर्शन करने की आशा रखते हैं।
 

अपनड़े घर जाईए, पैर तिनां दे चुम्म...

अहिंसा है इनका मूल भाव...

जो तैं मारण मुक्कियाँ, उनां ना मारो घुम्म,
अपनड़े घर जाईए, पैर तिनां दे चुम्म।
-यदि कोई आपको घूँसा भी मारे तो उसे पलट कर मत मारो। उसके पैरों को चूमो और अपने घर की राह लो।

चुपड़ी रोटी देखकर ईर्ष्या मत करो...

संतोष को भी दिए हैं शब्द...

रुखी सुक्खी खाय के, ठण्डा पाणी पी,
वेख पराई चोपड़ी, ना तरसाईये जी।
-रूखी सूखी जो मिले खाओ और ठण्डा पानी पियो। दूसरे की चुपड़ी रोटी देखकर ईर्ष्या मत करो।

सिर नीवां कर वेख...

दूसरों की निंदा से बचने का उपदेश...  

जे तू अकल लतीफ हैं, काले लिख ना लेख,
अपनड़े गिरह बान में, सिर नीवां कर वेख।
-यदि तुम में अक्ल है तो किसी की बुराई मत करो, बल्कि अपने गिरहबान में सिर झुका कर देखो।

सो तन जान मसान...

जिंदगी को प्रभु विरह की तान माना

बिरहा बिरहा आखिए, बिरहा हुं सुलतान,
जिस तन बिरहा ना उपजै, सो तन जान मसान।

-यदि जीवन में बिरह नहीं आया तो समझना जीवन एक तरह से श्मसान जैसा ही वीराना रहा।
8 वर्ष पहले
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