विज्ञापन

तरासी हुई अभिव्यक्ति के कवि आलोक धन्वा और उनकी कविताएं

काव्य डेस्क

Sahitya
विज्ञापन
                                    
                     
                                                  आलोक धन्वा ने एक ऐसी भाषा और ऐसी तरासी हुई अभिव्यक्ति हासिल की है, जिसमें सभी अतिरिक्त और अनावश्यक छीलकर अलग कर दिया गया है। कविता में उनके विचार जितने सशक्त हैं, भाषा उतनी ही सरल है। कविता आसानी से लोगों के समझ में आ सकती है। उनके रचना संसार में इनसानी सरोकार के साथ-साथ हवा, पानी, रेलवे, पशु-पक्षी, चांद-तारे तक शामिल हैं। 

उनका पहला संग्रह है- दुनिया रोज बनती है। ’जनता का आदमी’, ’गोली दागो पोस्टर’, ’कपड़े के जूते’ और ’ब्रूनों की बेटियाँ’ हिन्दी की प्रसिद्ध कविताएँ हैं। अंग्रेज़ी और रूसी में कविताओं के अनुवाद हुये हैं। उन्हें पहल सम्मान, नागार्जुन सम्मान, फ़िराक गोरखपुरी सम्मान, गिरिजा कुमार माथुर सम्मान, भवानी प्रसाद मिश्र स्मृति सम्मान मिले हैं।  

तुम एक पिछड़े हुए वक्ता हो 

तुम एक ऐसे विरोध की भाषा में बोलते हो 
जैसे राजाओं का विरोध कर रहे हो 
एक ऐसे समय की भाषा जब संसद का जन्म नहीं हुआ था 
विज्ञापन

यह राजा नहीं जिलाधीश है !

तुम क्या सोचते हो 
संसद ने विरोध की भाषा और सामग्री को वैसा ही रहने दिया है 
जैसी वह राजाओं के ज़माने में थी 

यह जो आदमी 
मेज़ की दूसरी ओर सुन रह है तुम्हें 
कितने करीब और ध्यान से 
यह राजा नहीं जिलाधीश है ! 

यह जिलाधीश है 
जो राजाओं से आम तौर पर 
बहुत ज़्यादा शिक्षित है 
राजाओं से ज़्यादा तत्पर और संलग्न ! 

यह दूर किसी किले में - ऐश्वर्य की निर्जनता में नहीं 
हमारी गलियों में पैदा हुआ एक लड़का है 
यह हमारी असफलताओं और गलतियों के बीच पला है 
यह जानता है हमारे साहस और लालच को 
राजाओं से बहुत ज़्यादा धैर्य और चिन्ता है इसके पास 

कभी-कभी तो इससे सीखना भी पड़ सकता है !

यह ज़्यादा भ्रम पैदा कर सकता है 
यह ज़्यादा अच्छी तरह हमे आजादी से दूर रख सकता है 
कड़ी 
कड़ी निगरानी चाहिए 
सरकार के इस बेहतरीन दिमाग पर ! 

कभी-कभी तो इससे सीखना भी पड़ सकता है !


 

अचानक तुम आ जाओ

अचानक तुम आ जाओ
इतनी रेलें चलती हैं
भारत में
कभी
कहीं से भी आ सकती हो
मेरे पास

कुछ दिन रहना इस घर में
जो उतना ही तुम्हारा भी है
तुम्हें देखने की प्यास है गहरी
तुम्हें सुनने की

कुछ दिन रहना
जैसे तुम गई नहीं कहीं

मेरे पास समय कम
होता जा रहा है
मेरी प्यारी दोस्त

घनी आबादी का देश मेरा
कितनी औरतें लौटती हैं
शाम होते ही
अपने-अपने घर
कई बार सचमुच लगता है
तुम उनमें ही कहीं
आ रही हो
वही दुबली देह
बारीक चारखाने की
सूती साड़ी
कंधे से झूलता
झालर वाला झोला
और पैरों में चप्पलें
मैं कहता जूते पहनो खिलाड़ियों वाले
भाग दौड़ में भरोसे के लायक

तुम्हें भी अपने काम में
ज़्यादा मन लगेगा
मुझसे फिर एक बार मिलकर
लौटने पर

दुख-सुख तो
आते जाते रहेंगे
सब कुछ पार्थिव है यहाँ
लेकिन मुलाक़ातें नहीं हैं
पार्थिव
इनकी ताज़गी
रहेगी यहीं
हवा में !
इनसे बनती हैं नई जगहें
एक बार और मिलने के बाद भी
एक बार और मिलने की इच्छा
पृथ्वी पर कभी ख़त्म नहीं होगी।

उतने सूर्यास्त के उतने आसमान 

उतने सूर्यास्त के उतने आसमान 
उनके उतने रंग
लम्बी सड़कों पर शाम
धीरे बहुत धीरे छा रही शाम
होंटलों के आसपास
खिली हुई रोशनी
लोगों की भीड़
दूर तक दिखाई देते उनके चेहरे 
उनके कंधे, जानी-पहचानी आवाज़ें
कभी लिखेंगे कवि इसी देश में 
इन्हें भी घटनाओं की तरह।
2 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Sanjai kumar

103 कविताएं

View Profile