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डॉ कलाम की जयंती पर याद आते हैं ये शेर...

काव्य डेस्क

Kavya Charcha
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भँवर से लड़ो तुंद लहरों से उलझो
कहाँ तक चलोगे किनारे किनारे
- शकील बदायुनी


चले चलिए कि चलना ही दलील-ए-कामरानी है
जो थक कर बैठ जाते हैं वो मंज़िल पा नहीं सकते
- हफ़ीज़ बनारसी

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इब्तिदा

ज़रा दरिया की तह तक तो पहुँच जाने की हिम्मत कर
तो फिर ऐ डूबने वाले किनारा ही किनारा है
- माहिर-उल क़ादरी


अभी से पाँव के छाले न देखो
अभी यारो सफ़र की इब्तिदा है
- एजाज़ रहमानी

यादों के नुक़ूश

कैसे आकाश में सूराख़ हो नहीं सकता
एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों
- दुष्यंत कुमार


जादा जादा छोड़ जाओ अपनी यादों के नुक़ूश
आने वाले कारवाँ के रहनुमा बन कर चलो
- अज्ञात

चराग़

जहाँ रहेगा वहीं रौशनी लुटाएगा
किसी चराग़ का अपना मकाँ नहीं होता
- वसीम बरेलवी


ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले
ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है
- अल्लामा इक़बाल

आसमाँ 

देख ज़िंदाँ से परे रंग-ए-चमन जोश-ए-बहार
रक़्स करना है तो फिर पाँव की ज़ंजीर न देख
- मजरूह सुल्तानपुरी


तू शाहीं है परवाज़ है काम तेरा
तेरे सामने आसमाँ और भी हैं
- अल्लामा इक़बाल
7 वर्ष पहले
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