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आज का शब्द तरुवर और गोपाल सिंह नेपाली का बेहतरीन गीत: पिया मिलन की घड़ियां रे 

रत्नेश मिश्र

Aaj Ka Shabd
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                                                  अपने विचारों, भावनाओं और संवेदनाओं को व्यक्त करने का सबसे सशक्त माध्यम मातृभाषा है। इसी के जरिये हम अपनी बात को सहजता और सुगमता से दूसरों तक पहुंचा पाते हैं। हिंदी की लोकप्रियता और पाठकों से उसके दिली रिश्तों को देखते हुए उसके प्रचार-प्रसार के लिए अमर उजाला ने ‘हिंदी हैं हम’अभियान की शुरुआत की है। इस कड़ी में साहित्यकारों के लेखकीय अवदानों को अमर उजाला और अमर उजाला काव्य हिंदी हैं हम श्रृंखला के तहत पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास कर रहा है। हिंदी हैं हम शब्द श्रृंखला में आज का शब्द है- तरुवर, जिसका अर्थ है- उत्तम या बड़ा वृक्ष, पेड़। प्रस्तुत है गोपाल सिंह नेपाली का बेहतरीन गीत: पिया मिलन की घड़ियां रे...

बाबुल तुम बगिया के #तरुवर, हम #तरुवर की चिड़ियां रे 
दाना चुगते उड़ जाएं हम, पिया मिलन की घड़ियां रे 
उड़ जाएं तो लौट न आयें, ज्यों मोती की लड़ियां रे 
बाबुल तुम बगिया के तरुवर …

आँखों से आँसू निकले तो पीछे तके नहीं मुड़ के
घर की कन्या बन का पंछी, फिरें न डाली से उड़ के 
बाजी हारी हुई त्रिया की 
जनम -जनम सौगात पिया की 
बाबुल तुम गूंगे नैना, हम आँसू की फुलझड़ियां रे 
उड़ जाएं तो लौट न आयें ज्यों मोती की लड़ियां रे 
 
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हमको सुध न जनम के पहले , अपनी कहां अटारी थी
आंख खुली तो नभ के नीचे , हम थे गोद तुम्हारी थी 
ऐसा था वह रैन -बसेरा 
जहां सांझ भी लगे सवेरा 
बाबुल तुम गिरिराज हिमालय , हम झरनों की कड़ियां रे 
उड़ जाएं तो लौट न आयें , ज्यों मोती की लड़ियां रे 

छितराए नौ लाख सितारे , तेरी नभ की छाया में 
मंदिर -मूरत , तीरथ देखे , हमने तेरी काया में 
दुःख में भी हमने सुख देखा 
तुमने बस कन्या मुख देखा 
बाबुल तुम कुलवंश कमल हो , हम कोमल पंखुड़ियां रे 
उड़ जाएं तो लौट न आयें , ज्यों मोती की लड़ियां रे 

बचपन के भोलेपन पर जब , छिटके रंग जवानी के 
प्यास प्रीति की जागी तो हम , मीन बने बिन पानी के 
जनम -जनम के प्यासे नैना 
चाहे नहीं कुंवारे रहना 
बाबुल ढूंढ फिरो तुम हमको , हम ढूंढें बांवरिया रे 
उड़ जाएं तो लौट न आयें , ज्यों मोती की लड़ियां रे 

चढ़ती उमर बढ़ी तो कुल -मर्यादा से जा टकराई 
पगड़ी गिरने के दर से , दुनिया जा डोली ले आई 
मन रोया , गूंजी शहनाई 
नयन बहे , चुनरी पहनाई 
पहनाई चुनरी सुहाग की , या डाली हथकड़ियां रे 
उड़ जाएं तो लौट न आयें , ज्यों मोती की लड़ियां रे 

मंत्र पढ़े सौ सदी पुराने , रीत निभाई प्रीत नहीं 
तन का सौदा कर के भी तो , पाया मन का मीत नहीं 
गात फूल सा , कांटें पग में 
जग के लिए जिए हम जग में 
बाबुल तुम पगड़ी समाज के , हम पथ की कंकरियां रे 
उड़ जाएं तो लौट न आयें , ज्यों मोती की लड़ियां रे 

मांग रची आंसू के ऊपर , घूंघट गीली आँखों पर 
व्याह नाम से यह लीला ज़ाहिर करवाई लाखों पर 

नेह लगा तो नैहर छूता , पिया मिले बिछुड़ी सखियां 
प्यार बताकर पीर मिली तो नीर बनीं फूटी अंखियां 
हुई चलाकर चाल पुरानी
नयी जवानी पानी पानी 
चली मनाने चिर वसंत में , ज्यों सावन की झड़ियां रे 
उड़ जाएं तो लौट न आयें , ज्यों मोती की लड़ियां रे 

देखा जो ससुराल पहुंचकर , तो दुनिया ही न्यारी थी 
फूलों सा था देश हरा , पर कांटों की फुलवारी थी 
कहने को सारे अपने थे 
पर दिन दुपहर के सपने थे 
मिली नाम पर कोमलता के , केवल नरम कांकरिया रे 
उड़ जाएं तो लौट न आयें , ज्यों मोती की लड़ियां रे 

वेद-शास्त्र थे लिखे पुरुष के , मुश्किल था बचकर जाना 
हारा दांव बचा लेने को , पति को परमेश्वर जाना 
दुल्हन बनकर दिया जलाया 
दासी बन घर बार चलाया 
माँ बनकर ममता बांटी तो , महल बनी झोपड़ियां रे 
उड़ जाएं तो लौट न आयें , ज्यों मोती की लड़ियां रे 

मन की सेज सुला प्रियतम को , दीप नयन का मंद किया 
छुड़ा जगत से अपने को , सिंदूर बिंदु में बंद किया 
जंजीरों में बाँधा तन को 
त्याग -राग से साधा मन को 
पंछी के उड़ जाने पर ही , खोली नयन किवड़ियां रे 
उड़ जाएं तो लौट न आयें , ज्यों मोती की लड़ियां रे 

जनम लिया तो जले पिता -माँ, यौवन खिला ननद -भाभी 
व्याह रचा तो जला मोहल्ला , पुत्र हुआ तो बंध्या भी 
जले हृदय के अन्दर नारी 
उस पर बाहर दुनिया सारी
मर जाने पर भी मरघट में , जल - जल उठी लकड़ियां रे 
उड़ जाएं तो लौट न आयें , ज्यों मोती की लड़ियां रे 

जनम -जनम जग के नखरे पर , सज -धजकर जाएं वारी 
फिर भी समझे गए रात -दिन हम ताड़न के अधिकारी 
पहले गए पिया जो हमसे अधम बने हम यहां अधम से 
पहले ही हम चल बसें , तो फिर जग बाटें रेवड़ियां रे 
उड़ जाएं तो लौट न आयें , ज्यों मोती की लड़ियां रे
5 वर्ष पहले
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