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वंशीधर शुक्ल की कविता- उठो सोने वालो! सबेरा हुआ है

काव्य डेस्क

Kavita
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                            उठो सोने वालो! सबेरा हुआ है;
        
                                                    
                            
वतन के फ़कीरों का फेरा हुआ है।

जगो, अब निराशा-निशा खो रही है;
सुनहली-सी पूरब दिशा हो रही है;
उषा की किरण कालिमा धो रही है,
न अब क़ौम कोई कहीं सो रही है;

तुम्हें किसलिए मोह घेरा हुआ है।
उठो सोने वालो! सबेरा हुआ है।

जवानो! जगो, क़ौम की जान जागो,
पड़े किसलिए देश की शान जागो;
ग़ुलामी मिटे देश उत्थान जागो,
शहीदों की सच्ची सुसंतान जागो;

हटा दूर आलस-अँधेरा हुआ है।
उठो सोने वालो! सबेरा हुआ है।

उठो देवियो! वक़्त खोने न देना,
कहीं फूट के बीज बोने न देना;
जगें जो, उन्हें फिर से सोने न देना
कभी राष्ट्र-अपमान होने न देना;

घड़ी शुभ महूरत का डेरा हुआ है।
उठो सोने वालो सबेरा हुआ है।

नई रोशनी मुल्क में उग रही है,
युगों बाद फिर हिंद-माँ जग रही है;
ख़ुमारी बचा प्राण को भग रही है,
दिलों में निराली लगन लग रही है:

मुसीबत से अब तो निबेरा हुआ है।
उठो सोने वालो सबेरा हुआ है।

हवा क्रांति की झूमती डाली-डाली,
बदल जाने वाली है शासन प्रणाली;
जगो, देख लो कैसी रौनक़-निराली,
सितारे गए, आ गया अंशुमाली;

घरों में, दिलों में उजेरा हुआ है।
उठो सोने वालो! सबेरा हुआ है।

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3 महीने पहले
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