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सोहनलाल द्विवेदी: नयनों की रेशम डोरी से अपनी कोमल बरजोरी से

काव्य डेस्क

Kavita
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नयनों की रेशम डोरी से
अपनी कोमल बरजोरी से।

रहने दो इसको निर्जन में
बांधो मत मधुमय बन्धन में,
एकाकी ही है भला यहाँ,
निठुराई की झकझोरी से।

अन्तरतम तक तुम भेद रहे,
प्राणों के कण कण छेद रहे।
मत अपने मन में कसो मुझे
इस ममता की गँठजोरी से।

निष्ठुर न बनो मेरे चंचल
रहने दो कोरा ही अंचल,
मत अरूण करो हे तरूण किरण।
अपनी करूणा की रोरी से।
 
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2 महीने पहले
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