विज्ञापन

Poetry on pollution: ऐ हवा ! दिल्ली को नहीं बताना

काव्य डेस्क

Kavita
विज्ञापन
                                    
                                                                        
                            ऐ हवा !
        
                                                    
                            
दिल्ली को नहीं बताना 
मेरे प्रियतम का ठिकाना,
नहीं तो, आऊंगा नहीं मैं 
वह लाख करे बहाना।

इस दिल्ली में वह हर समय 
नकाब लगाए रखती है 
अपने चांद जैसे चेहरे पर,
जैसे ग्रहण सजाए रखती है।
हरदम रहती खांसती-छींकती 
जैसे कोई मर्सिया सुनाए जाती है,
मेरी रूमानी चाहतों पर
लाखों बंदिशें लगाए जाती है।

उसके बदन की खुशबू को 
शर्मसार करती है हवा 
और मेरे प्रणय निवेदन को 
बेजुबान करती है दिल्ली की हवा।

इसलिए ऐ हवा!
दिल्ली को नहीं बताना 
मेरे प्रियतम का ठिकाना 
नहीं तो, मैं नहीं आऊंगा 
वह चाहे लाख करे बहाना।

 राकेश धर द्विवेदी 

हमारे यूट्यूब चैनल को Subscribe करें। 

8 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Anil Kumar

4215 कविताएं

View Profile

Rajiv Tyagi

423 कविताएं

View Profile

Sanjay Nirala

42 कविताएं

View Profile

Updesh Kumar

12437 कविताएं

View Profile