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निर्मला गर्ग की कविता- जीवन मैदानों से ज़्यादा विस्तृत है

काव्य डेस्क

Kavita
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                            जानती हूँ जीवन मैदानों से ज़्यादा विस्तृत है
        
                                                    
                            
हथेलियों से ज़्यादा सुंदर है
और धातु से ज़्यादा कठोर है
जीवन का अनुवाद किसी भी भाषा में
सिर्फ़ जीवन है

जीवन विन्यास है ऋतुओं का
नदियों का
उन रास्तों का
जिनसे होकर हम काम पर जाते हैं

वह मुझे प्रिय है शब्दों से ज़्यादा
आँसुओं से ज़्यादा
रात के रहस्य से ज़्यादा

फिर भी कभी-कभी मृत्यु के बारे में सोचना
मुझे अच्छा लगता है
जैसे मरने के बाद मेरा मन किंवा अंत:करण
उसी तरह शांत हो जाएगा जैसे
बर्फ़ पड़ने के बाद की ख़ामोशी?

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3 महीने पहले
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