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नवीन सागर की कविता- प्यार के बहुत चेहरे हैं

काव्य डेस्क

Kavita
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                            मैं उसे प्यार करता 
        
                                                    
                            
यदि वह 
ख़ुद वह होती 

मैं अपना हृदय खोल देता 
यदि वह 
अपने भीतर खुल जाती 

मैं उसे छूता 
यदि वह देह होती 
और मेरे हाथ होते मेरे भाव! 

मैं उसे प्यार करता 
यदि मैं पत्ता या हवा होता 
या मैं ख़ुद को नहीं जानता 
मैं जब डूब रहा था 
वह उभर रही थी 
जिस पल उसकी झलक दिखी 

मैं कभी-कभी डूब रहा हूँ 
वह अभी-अभी अपने भीतर उभर रही है 

मैं उसे प्यार करता 
यदि वह जानती 
मैं ख़ामोशी की लय में अकेला उसे प्यार करता हूँ 
प्यार के बहुत चेहरे हैं। 
2 वर्ष पहले
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