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माखनलाल चतुर्वेदी: किस प्रकार घड़ियाँ गिनता हूँ दिन के बरस बनाता हूँ

काव्य डेस्क

Kavita
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किस प्रकार घड़ियाँ गिनता हूँ
दिन के बरस बनाता हूँ
खान-पान की ज्ञान-ध्यान की
धूनी यहाँ रमाता हूँ।

तुमको आया जान, वायु में
बाँहों को फैलाता हूँ
चरण समझते हुए सीखचों
पर मैं शीश झुकाता हूँ।

सुध-बुध खोने लगे, कहो
क्या पूरी नहीं सुनोगे तान?
होता हूँ क़ुरबान, बताओ—
किस क़ीमत पर लोगे जान?
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6 महीने पहले
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