किस प्रकार घड़ियाँ गिनता हूँ
दिन के बरस बनाता हूँ
खान-पान की ज्ञान-ध्यान की
धूनी यहाँ रमाता हूँ।
तुमको आया जान, वायु में
बाँहों को फैलाता हूँ
चरण समझते हुए सीखचों
पर मैं शीश झुकाता हूँ।
सुध-बुध खोने लगे, कहो
क्या पूरी नहीं सुनोगे तान?
होता हूँ क़ुरबान, बताओ—
किस क़ीमत पर लोगे जान?
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