नहीं हलाहल शेष, तरल ज्वाला से अब प्याला भरती हूँ।
विष तो मैंने पिया, सभी को व्यापी नीलकंठता मेरी;
घेरे नीला ज्वार गगन को बाँधे भू को छाँह अँधेरी;
सपने जमकर आज हो गए चलती-फिरती नील शिलाएँ,
आज अमरता के पथ को मैं जलकर उजियाला करती हूँ।
हिम से सीझा है यह दीपक आँसू से बाती है गीली;
दिन से धनु की आज पड़ी है क्षितिज-शिञ्जिनी उतरी ढीली,
तिमिर-कसौटी पर पैना कर चढ़ा रही मैं दृष्टि-अग्निशर,
आभाजल में फूट बहे जो हर क्षण को छाला करती हूँ।
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पग में सौ आवर्त बाँधकर नाच रही घर-बाहर आँधी
सब कहते हैं यह न थमेगी, गति इसकी न रहेगी बाँधी,
अंगारों को गूँथ बिजलियों में, पहना दूँ इसको पायल,
दिशि-दिशि को अर्गला प्रभञ्जल ही को रखवाला करती हूँ!
नहीं हलाहल शेष, तरल ज्वाला से मैं प्याला भरती हूँ।