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Hindi Kavita: केतन यादव की कविता 'जीवन में अनंत कविता सी रही माँ'

काव्य डेस्क

Kavita
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                            बचपन में लौटने पर मिलती है
        
                                                    
                            
कभी कथरी-गुदड़ी सुखाते
अपने पैरों पर पेटकुइयाँ लिटाए मालिश करते
चौके से झाँ कहकर झाँकते हुए
चोट पर गरम हल्दी-प्याज लगाते
गाल दबाकर सीधा मांग कंघी करते
और पास सुलाकर कहानियाँ सुनाते हुए

मिल जाती है, मेरे रोते हुए चेहरे को देखकर
मेरा होमवर्क मेरी राइटिंग में रचते हुए

भूख लगने पर उसकी दी हुई
चीनी की रोटी या नमक तेल पुती चपाती
बड़े प्रेम से आँगन में घूम-घूम खाते थे
जैसे नाप रहे हों सपनों की धरती को ,
पहली रोटी से पहले आँटे की पकी चिड़िया
खूब उछल कूद करती थी साथ अपने,
पतंग कट जाने के दुख को माँ
बरसाती में फूँक भर कर पूरा कर देती थी
उसकी प्राणवायु से भरा ये खिलौना
उड़ जाता था हमारी उदासी लेकर

सब्जी न होने पर चना और सोयाबीन के सहारे
आलू को विशेष बना देती है वह
घर के सामान  की एक-एक जगह पहचानती है माँ
जो पिता और मैं न पहचान पाए कभी
पर्स मोजा पेन कागज गेंद सबकी जगह
एक पुकार में सब सजीव हो उठते थे सामने
सब पहचानते हैं माँ को

सिर की नसें उसकी उँगलियों को पहचानती हैं
नींद पहचानती है उसकी गोद को
अंतड़ियाँ मेरी उसके पेट में ही बनी
इसीलिए चूल्हे से पहले वहाँ आग लग जाती है

खंडित आत्म लिए जब मैं विकल भटकता हूँ
तब अनगिनत निर्थक प्रयास के बाद तुम कौंधती हो
अंतत: मैं तुम्हारे शरीर का एक टुकड़ा भर ही तो हूँ
तुम्हारी माँस के लोथड़ों और  रक्त के थक्कों से ही बना हूँ ‘मैं’
तुम्हारी संपूर्ण संवेदना से निर्मित
एक जिंदा इंसान
पहली साँस तुम्हारे फेफड़ों से लिया था
पहली भूख तुम्हारे मुँह के निवाले से मिटी
मेरी पहली हरकत से तुम्हे भी जीवन मिला था न ?

तुम मेरे जीवन में अनंत कविता सी रही माँ
कोई विराम चिन्ह नहीं रहा तुम्हारे प्रेम में
तुम्हारे बहुत थोड़े भर होने में
मेरा बहुत सारा होना निहित है

मेरी भाषा अनुस्यूत है तुम्हारे प्रेम के रिक्त स्थान से।

3 वर्ष पहले
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