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केदारनाथ सिंह: कितना कुछ कह गए जूते

काव्य डेस्क

Kavita
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सभा उठ गई
रह गए जूते
सूने हाल में दो चकित उदास
धूल भरे जूते
मुँहबाए जूते जिनका वारिस
कोई नहीं था

चौकीदार आया
उसने देखा जूतों को
फिर वह देर तक खड़ा रहा
मुँहबाए जूतों के सामने
सोचता रहा -
कितना अजीब है
कि वक्ता चले गए
और सारी बहस के अंत में
रह गए जूते

उस सूने हाल में
जहाँ कहने को अब कुछ नहीं था
कितना कुछ कितना कुछ
कह गए जूते 
 
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5 महीने पहले
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