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महादेवी वर्मा की कविता- झिलमिल तारों की पलकों में

काव्य डेस्क

Kavita
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                            झिलमिल तारों की पलकों में
        
                                                    
                            
स्वप्निल मुस्कानों को ढाल,
मधुर वेदनाओं से भर के
मेघों के छायामय थाल;

रंग डाले अपनी लाली में
गूँथ नये ओसों के हार,
विजन विपिन में आज बावली
बिखराती हो क्यों शृंगार?

फूलों के उच्छवास बिछाकर
फैला फैला स्वर्ण पराग,
विस्मॄति सी तुम मादकता सी
गाती हो मदिरा सा राग;

जीवन का मधु बेच रही हो
मतवाली आँखों में घोल
क्या लोगी? क्या कहा सजनि
'इसका दुखिया आँसू है मोल'!

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10 महीने पहले
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